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संख्या का महत्व ..इस श्रृंखला की अगली कड़ी फिर कभी ......क्योँकि आजकल हम हैं तन्हा और यह हाल है हमारा ....लीजये प्रस्तुत है आज बहुत दिनों बाद आपके लिए यह कविता .....!तन्हाई के आलम में अन्धेरा आँखों के सामने होता है दुखी दिल तुम्हारे वियोग में टूट - टूट कर , न जागत...
हमारे जीवन और इस दृश्यमान प्रकृति में संख्याओं का बहुत महत्व है . संख्या के इस चक्कर से कोई भी अछूता नहीं . सृष्टि के प्रारंभ से आज तक हम जो कुछ भी सहेज पाए हैं उसमें सख्या की भूमिका को किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता . दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकत...
काश ! हम जीवन की उन्मुक्तता को समझ पाते, मर्यादा में रहते और जीवन के वास्तविक लक्ष्यों को पाने का प्रयास करते, मानसिक रूप से स्वस्थ जीवन जीते धरती के इस वातावरण को अपने मानसपटल से सुंदर बनाने का प्रयास करते ....लेकिन अभी तक ऐसा कोई चिराग नजर नहीं आता जो सभी के लिए...
हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति कभी किसी को दोष नहीं देती , लेकिन वह बदला भी आसानी से ले लेती है . इस दिशा में यूरोप को तो यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि 2003 में लू की चपेट में किस प्रकार 40 हजार लोग मरे थे . यह सिर्फ यूरोप की ही स्थिति नहीं है दुनिया के तमाम द...
आजकल देश के हर भाग में भीषण गर्मी पड़ रही है . मौसम विज्ञान विभाग हर दिन तापमान बढ़ने  के आंकड़े जारी करता है , और साथ में यह भी चेतावनी देता है कि आने वाले दो दिनों में पारा उंचाई की तरफ जाने वाला है तो इंसान त्राहि - त्राहि करने लगता है . इंसान ही क्योँ धरती क...
गतांक से आगे...!!! मनुष्य जब भौतिक चीजों से उपर उठकर सिर्फ और सिर्फ ईश्वर को पाने के लिए प्रार्थना करता है तो उसकी प्रार्थना उसे आनंद देने वाली होती है, और वास्तविक मायनों में यह ही सच्ची प्रार्थना है. क्योँकि इस प्रार्थना का फल हमेशा उसे आनंद देता है. जिसने इबादत...
हम तो मायावी संसार को देखकर इसमें इतने रम जाते हैं कि अपनी वास्तविक स्थिति को ही भूल जाते हैं, और अगर ऐसा नहीं होता तो आज संसार के यह हालात नहीं होते. गतांक से आगे...! जीव जैसे ही इस दृश्यमान जगत में विचरता है तो यह दृश्यमान जगत उसे अपनी और आकर्षित करता है, क्योँकि...
गतांक से आगे.......! मनुष्य ने सृष्टि के प्रारंभ से लेकर आज तक कर्म और भाग्य के द्वंद्व को समझने की कोशिश की है और इस दिशा में उसे काफी हद तक सफलता भी मिली है. कठोपनिषदमें कर्म की अनित्यता पर विचार किया गया है "जानाम्यह शेवधिरित्यनित्यं, न ह्यध्रुवै: प्राप्यते हि ध...
इस ब्रह्माण्ड को जब भी हम देखते हैं, महसूस करते हैं, इसके रहस्यों को जानने की जब कोशिश करते हैं तो कहीं पर हम सीमित हो जाते हैं. हमारी सोच का दायरा, कल्पना की उड़ान, समझ की सीमा सब छोटा पड़ जाता है. जब भी इस विश्व को देखते हैं तो ऐसा लगता है कि आखिर यह सब कुछ व्यवस्थ...
आज के सन्दर्भ में अगर हम देखें तो लोगों पर विज्ञापन बहुत हावी हो गया है . कुछ लोगों के लिए यह व्यक्तिगत प्रचार का साधन है तो कुछ के लिए यह अपनी वस्तुओं को आम लोगों तक पहुँचाने का  . यहाँ तक तो ठीक है , लेकिन जब जीवन सन्दर्भों को विज्ञापन के माध्यम से भुनाने...