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भारत माता की जय !! वन्दे मातरम !!! ज़िंदाबाद - मुर्दाबाद !!! आदि नारे किसी भी जुलूस या प्रदर्शन का हिस्सा  होते हैं . आजकल देखता हूँ कि यह नारे आम हो गए हैं . हर गली मोहल्ले में इनकी गूंज सुनाई  देती है . जब हम कोई विरोध या प्रदर्शन करते हैं तो, हम अपनी...
अब मुझे और प्यार नहीं होताअब तेरा इन्तजार नहीं होतातन्हा रहा हूँ बहुत वक़्त मगरतन्हाई का पल यादगार नहीं होताजीने मरने की कसमें खाई हमने बिछुड़ने के बाद, यार -यार नहीं होताकभी तन्हाई में हुई जो बातें तुमसेबातें- बातें हैं , बातों का संसार नहीं होता मुहब्बत...
 पोस्ट लेवल : विरह प्रेम ग़ज़ल खुदी
गतांक से आगे ..........! आज भी जब इंसान को इंसान की तरफ तलवार, गोला बारूद , और भी ना जाने क्या -क्या  लिए देखता हूँ तो आँखें चुंधिया जाती हैं . कोई धर्म को लेकर लड़ रहा है तो कोई जाति को लेकर , किसी का राम बड़ा है, तो किसी का अल्लाह , किसी को मस्जिद चाहिए तो...
पिछले दो दिनों से देख रहा हूँ कि हर तरफ शुभकामनाओं को बांटने का सिलसिला अनवरत रूप से जारी है , और यह होना भी चाहिए . क्योँकि हम सब समाज का हिस्सा हैं और समाज के हर व्यक्ति के हितों की चिंता करना हमारा कर्तव्य है . किसी हद तक जब किसी को शुभकामनायें देते देखता हूँ...
जीवन और साहित्य एक दूसरे  के पर्याय हैं . जीवन का कोई भी पक्ष ऐसा नहीं है जिसे साहित्य में स्थान नहीं दिया गया हो , दूसरे  शब्दों में यह भी  ही कह सकते हैं कि जीवन ही साहित्य है और साहित्य ही जीवन . यहाँ "साहित्य" शब्द को व्यापक अर्थों में ग्रहण कर...
मानव अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए चिरकाल से नए - नए माध्यमों को अपनाता रहा है . सृष्टि के प्रारंभिक दिनों में ही उसे अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए कुछ साधनों की तलाश करनी पड़ी होगी . जिनमें से भाषा का विकास और उसे भावनाओं से जोड़ने का उसका प्रयत्...
हाल कैसे करूँ वयां , अजीब समां आया हैसाँसों में है बैचनी , दिल भी घबराया हैइन्तजार में तुम्हारे , हम बेसुध से हो गएपिया तुम कहाँ चले गए ...................!इजहार कबूल कर , दिल को था थाम लिया सब बंधन तोड़कर , सोच को था अंजाम दिया तुम्हारी याद में , सुख चैन मेरे लुट ग...
 पोस्ट लेवल : विरह गीत Kewal Ram प्रेम मिलन
भीड़ - भाड़ की इस दुनिया से दूरसुंदर सी नगरी बसाना चाहता हूँ मैंप्यार और सहयोग हो जहाँऐसा मंच सजाना चाहता हूँ मैंवैर, ईर्ष्या, नफरत ना हो जहाँऐसा घर बनाना चाहता हूँ मैं  .मानव - मानवता को समझेऐसी दृष्टि बनाना चाहता हूँ मैंहो जहाँ पूजा इंसान की खुदा समझकरऐसे म...
 पोस्ट लेवल : Kewal Ram सद्भाव शांति कविता
जब भी मुझे कहीं अकेले में बैठने का अवसर मिलता है तो मैं महसूस  हूँ कि इस सृष्टि के कण - कण में संगीत है. इसमें सुर समाया है . लेकिन हम उस संगीत को अनुभव नहीं कर पाते . आज हम भौतिकता में इतने रम चुके हैं कि हमारे पास कहाँ वक्त है उस संगीत को सुनने, का अनुभव करन...