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पहचानों के दायरे में सिमटता इनसान संभवतः अपनी वास्तविक पहचान को भूल गया है. ऐसा कौन सा समय रहा होगा जब मनुष्य ने खुद को मनुष्य के रूप में समझा होगा. इतिहास का गहन अध्ययन करने के पश्चात इस बात के संकेत कम ही मिलते हैं कि इनसान ने इस धरती पर जन्म लेने के बाद खुद को इ...
लेकिन दो से एक होने के मायने और एक और एक होने के मायने बहुत अलग हैं. मैं उसे यही बात समझाने की कोशिश करता, लेकिन उसे लगता कि प्रेम में सिद्धान्त का क्या काम, वहां तो मौज-मस्ती है, घूमना फिरना है, गप्पें मारना है, मिलना-जुलना है और फिर एक उम्र के बाद शादी के बन्धन म...
एक दिन मैं अपने मित्र से बात कर रहा था. बातों-बातों में बात प्रेम के विषय तक आ पहुंची. बात-बात में मैंने महसूस किया कि वह अपने प्रेम को लेकर संशय की स्थिति में है. वह अपने प्रेम के अनुभवों और भविष्य की स्थितियों को लेकर बहुत असमंजस में था. उसे लग रहा था कि कहीं वह...
‘मनुष्य’ शब्द जब भी जहन में आता है तो मन ‘कल्पना’ में कहीं खो जाता है, और वह कल्पना मनुष्य जाति के इतिहास और वर्तमान का आकलन करते हुए भविष्य की और ले जाती है. हालांकि यह भी सच है कि मनुष्य कभी भी भविष्य के बारे में कुछ भी दृढ रूप से नहीं कह सकता. लेकिन वह इतिहास का...
जीवन एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है. मनुष्य जीवन के विषय में शायद तब भी कोई विचार नहीं करता जब वह बहुत गहरे संकट में होता है. यहाँ तक कि मनुष्य जब मृत्यु शैय्या पर होता है तब भी वह जीवन की प्रासंगिकता के विषय में नहीं, बल्कि अपनी बनी-बनायी दुनिया के विषय में सोचता ह...
गतअंक से आगे.. अधिकतर यह देखा गया है कि जो व्यक्ति जितने विराट व्यक्तित्व का स्वामी होगा, उसमें ज्ञान की सम्भावना  उतनी ही अधिक होगी. उस व्यक्ति के लिए हमारा दृष्टिकोण अध्यात्म के आधार पर विकसित होता है. कई बार तो हम ऐसा भी सोच-समझ लेते हैं कि अमुक व्यक्ति में...
ज्ञान और विज्ञान जीवन के दो पहलू है. ज्ञान जहाँ हमारी भीतरी समझ को विकसित करता है, वहीं विज्ञान हमारी बाहरी उलझन को सुलझाने की कोशिश करता है. ज्ञान और विज्ञान मिलकर जीवन को जो अर्थ प्रदान करते हैं, वह हम किसी और माध्यम से प्राप्त नहीं कर सकते. जैसे पक्षी को ऊँची उड़...
गतांक से आगे उपरी तौर पर देखा जाए तो पूरे विश्व में मानवीय पहलुओं की दुहाई देने वालों की कमी नहीं है. लेकिन यथार्थ में जो कुछ भी घटित हो रहा है उसका चेहरा बड़ा विद्रूप है. कई बार तो ऐसा लगता है कि मनुष्य जो कुछ कह रहा है या जो कुछ उसके द्वारा किया जा रहा है वह...
आज से पांच हजार साल पहले के इतिहास की तरफ जब हम देखते हैं तो, हमें मनुष्य के होने के कुछ चिन्ह दिखाई देने शुरू हो जाते हैं. मनुष्य ही क्योँ हमें इतिहास के इस पहलू पर भी ध्यान देना होगा कि मनुष्य के होने से पहले इस धरा पर क्या था? और उसकी उत्पत्ति कैसे हुई? हो सकता...
 पोस्ट लेवल : मानवता आलेख भुखमरी
'मैं' और 'आप'जब ‘हम’ हो गए सत्ता समाप्त हो गयी ‘दो’ की एकाकार हो गए, शब्द और भाव शब्द संकुचित-अर्थ विस्तृत अहसासों के गर्भ में शब्दों के अर्थ खो गए पता नहीं हम 'दो' थे कैसे दो से 'एक' हो गए ना जाने कैसे हमारे अहसास एक हो गए दूरियां मिट गयी जो दरमियाँ थीं जीवन के रं...
 पोस्ट लेवल : याद तुम अहसास कविता