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दीपमालिका दीप ज्योति संगभर-भर खुशियां लायीनवल ज्योति की पावन आभा प्रकाश पुंज ले आयीप्रज्वलित करने मन प्रकाश कोदीपशिखा लहरायीपुलकित गात,मुदित उर बीचज्यों स्नेह धारा बह आयीअमावस के अंधियारे परदीप  चांदनी  छायीमन तारों ने झंकृत होगीत  बधाई  गय...
          तुम्ही छविकार चित्रकारा तप्त से इस जग में हो बस तुम ही अनुधारातुम्ही रंगरेज तुम्ही छविकार, मेरे चित्रकारा,रंग सात नही सौ रंगो से रंग दिया तूने मुझकोरंगाई ना दे पाई तेरे पावन चित्रों की तुझको।हे सुरभित बिन्दु मेरे ललाट के अविर...
धवल ज्योत्सना पूर्णिमा की अंबर रजत चुनर ओढ, मुखरितडाल-डाल चढ़ चंद्रिका  डोलतपात - पात पर  रमत  चंदनियातारक दल  सुशोभित  दमकतनील कमल पर अलि डोलत यूंज्यों श्याम मुखबिंद काले कुंतलगुंचा महका ,  मलय  सुवासितचहुँ ओर उजली किरण सुशो...
पलाश का मौसम अब आने को है,जब खिलने लगे पलाशसंजो लेना आंखों मेंसजा रखना हृदय तल मेंफिर सूरज कभी ना डूबने देनाचाहतों के पलाश काबस यूं ही खिले-खिले रखना,हरी रहेगी अरमानों की बगियाप्रेम के हरे रहने तक।           कुसुम कोठारी ।
कैसो री अब वसंत सखी ।जब से श्याम भये परदेशीनैन बसत सदा मयूर पंखीकहां बस्यो वो नंद को प्यारोउड़ जाये मन बन पाखीकैसो री अब वसंत सखी।सुमन भये सौरभ विहीनरंग ना भावे सुर्ख चटकीलेखंजन नयन बदरी से सीलेचाँद लुटाये चांदनी रुखीकैसो री अब वसंत सखी।धीमी बयार जीया जलाएफीकी चंद्...
पत्थरों के शहरये क्या कि पत्थरों के शहर मेंशीशे का आशियाना ढूंढते हो!आदमियत  का पता  तक  नहींग़ज़ब करते हो इन्सान ढूंढ़ते हो !यहाँ पता नही किसी नियत काये क्या कि आप ईमान ढूंढते हो !आईनों में भी दग़ा  भर गया यहांअब क्या सही पहचान  ढूंढते हो...
 पुतला नही प्रवृति का दहनमन का रावणआज भी खड़ा हैसर तान करअंगद के पाँव जैसा,सदियां बीत गईरावण जलातेपुतला भस्म होता रहा हर बाररावण वहीं खड़ा रहाअपने दंभ के साथसीना तानेक्या जलाना है ?पुतला या प्रवृतिबस लकीर पीट रहें हैंबैठे बैठे हमकाश साल मेंएकबार ही सही ,मन की...
मेघों का काम है वर्षा के रूप में जल का वरदान बन बरसाना , प्रकृति निश्चित करती है कब, कितना, कंहा।फिर ऐसा समय आता है पानी से मुक्त बादल नीले आसमान पर यूं ड़ोलते हैं ,निज कर्त्तव्य भार से उन्मुक्त हो वलक्ष रेशमी रूई जैसे....व्योम पर बिखरे दल श्वेत सारंगहो उन्मुक्त नि...
एक यवनिका गिरने को है,जो सोने सा दिख रहा वोअब माटी का ढेर होने को है,लम्बे सफर पर चल पङानींद गहरी सोने को है।एक यवनिका .....।.जो समझा था सरुप अपनावो सरुप अब खोने को है,अब जल्दी से उस घर जानाजहाँ देह नही सिर्फ़ रूह है।एक यवनिका ....डाल डाल जो फूदक रहावो पंक्षी कितना...
गांधी जयंती की हार्दिक शुभकामनाएंराष्ट्रपिता को संबोधन , क्षोभ मेरे मन का :-बापू कहां बैठे हो आंखें छलकायेक्या ऐसे भारत का सपना था?बेबस बेचारा पस्त थका - थकाइंसानियत सिसक रहीप्राणी मात्र निराश दुखीगरीब कमजोर निःसहायहर तरफ मूक हाहाकारकहारती मानवता,झुठ फरेबरोता हुवा...