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'धारयति इति धर्मः'- जिसे धारण किया जाए वही धर्म है अच्छे कर्म करना ही जीवन का मर्म है लेकिन; ये शब्द और उनके वास्तविक अर्थ सदियों पहले खुद ही कहने के बाद अब हम भूलते जा रहे हैं भटकते जा रहे हैं, कई टुकड़ों...
 पोस्ट लेवल : पंक्तियाँ
वो जो निर्दयी समाज के ताने-बाने में बुरी तरह फँसकर पंचायतों के चक्रव्यूहों में उलझ कर बलि चढ़ जाता है खोखले उसूलों की तलवारों से कट कर.... ?या वो जिसे तमाम अग्नि परीक्षाओं से गुज़ारकर भी ठुकरा दिया जाता है एकतरफा करार...
 पोस्ट लेवल : पंक्तियाँ
खबर वह होती है जो निष्पक्ष तरीके से सबके सामने आए और पत्रकारिता वह है जो जिसमें सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस हो। जिसमें कुछ भी छुपा न हो। लेकिन विगत कुछ वर्षों से बदलाव और विभाजन हर क्षेत्र में स्पष्टतः नजर आ रहा है तो ऐसे में कुछ खबरें अगर जानबूझ कर जन सा...
 पोस्ट लेवल : संकलन
छायावाद हर कलम से कागज पर छपने लगा आया नहीं बसंत कि बस प्रेम दिखने लगा। कोई राधा, कोई मीरा कोई गोपियों की बात करता है कोई संयोग में रमा-पगा कोई वियोगी सा व्याकुल लगता है। किसी को दिखती है पीली बहार हर तरफ...
 पोस्ट लेवल : बस यूं ही पंक्तियाँ
एक ही बात का एक नजरिया बिल्कुल सीधा वास्तविक सा बिना लाग-लपेट जैसा है वैसा ही दिखने वाला मन की कहने वाला बिल्कुल सपाट और स्पष्ट सबसे बेपरवाह मौसम का हर रूप देखने वाला शीत और तपन सहने वाला।&n...
 पोस्ट लेवल : Beautiful Pictures पंक्तियाँ
समय के साथ चलते-चलते नयी मंजिल की तलाश में भटकते-भटकते कई दोराहों-चौराहों से गुजर कर अक्सर मिल ही जाते हैं हर देहरी पर बिखरे-बिखरे से उलझे-उलझे से भीतर से सुलगते से कुछ नये अल्फाज़ जिन्हें गर कभी मयस्सर हुआ&nbsp...
 पोस्ट लेवल : पंक्तियाँ
जो जाना जाता था किसान के हल से अपने सुनहरे कल से जिसके खेतों में फसलें झूम-झूम कर हवा से ताल मिलाती थीं पत्ती-पत्ती फूलों से दिल का हाल सुनाती थी जहाँ संपन्नता तो नहीं संतुष्टि की खुशहाली थी महंगी विलासिता तो नहीं&n...
रिश्ते जरूरी नहीं रिश्तों के बिना भी अब तक अनजान कुछ लोग अचानक ही कहीं मिलकर अपने से लगने लगते हैं मीलों दूर हो कर भी उनकी दुआओं के कंपन संजीवनी के रंगों से उम्मीदों के कैनवास पर दिखने लगते हैं। रिश्ते जरूरी नहीं रिश्तों के बिना भी नीरस ज...
 पोस्ट लेवल : पंक्तियाँ
कितने ही शब्द हैं यहाँ कुछ शांत कुछ बोझिल से उतर कर चले आते हैं मन के किसी कोने से कहने को कुछ अनकही सिमट कर कहीं छुप चुकीं वो सारी राज की बातें जिनकी परतें गर उधड़ गईं तो बाकी न रहेगी कालिख के आधार पर...
 पोस्ट लेवल : पंक्तियाँ