ब्लॉगसेतु

जब कभी भी हम अपने समकालीन कथाकारों के बारे में सोचते हैं तो हमारे ज़हन में बिना किसी दुविधा के एक नाम शोभा रस्तोगी जी का भी आता है जो आज की तारीख में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। लघुकथाओं के क्षेत्र में उन्होंने उल्लेखनीय काम किया है। ऐसे में जब पता चला कि इस बार ज...
कहते हैं कि समय से पहले और किस्मत से ज़्यादा कभी कुछ नहीं मिलता। हम कितना भी प्रयास...कितना भी उद्यम कर लें लेकिन होनी...हो कर ही रहती है। ऐसा ही इस बार मेरे साथ हुआ जब मुझे प्रसिद्ध लेखक हरिमोहन झा जी द्वारा लिखित किताब "खट्टर काका" पढ़ने को मिली। इस उपन्यास...
"नॉस्टेल्जिया"बताओ ना...पुन: क्यूँ रचें...लिखें...पढ़ें..या फिर स्मरण करें..एक दूसरे को ध्यान में रख कर लिखी गयी उन सब तमाम..बासी..रंगहीन..रसहीन प्रेम कविताओं को बताओ ना...क्यूँ स्मरण करें हम...अपने उस रूमानी..खुशनुमा दौर को क्या मिलेगा या फिर मिलने व...
"सब्र"मुंह में दांत नहीं...पेट में आंत नहीं..फिर भी देख..मौजूद कितना..मुझमें सब्र है ब्याह करने को..अब भी उतावला हूँ..बेशक..पाँव लटके हैं..और तैयार देखो..हो रही मेरी कब्र है
"तंग आ गए यार खाली बैठे बैठे। तू बात कर ना शायद कहीं कोई ऑनलाइन काम ही मिल जाए। लॉक डाउन की वजह से यहाँ बाहर तो सब का सब ठप्प पड़ा है।""हाँ!...यार...खाली बैठे बैठे तो रोटियों तक के लाले पड़ने को हो रहे हैं।""तू बात कर ना कहीं। तेरी तो इतनी जान पहचान है।""हम्म....बात...
क्या करें यार...यहाँ इस स्साले  लॉक डाउन में फँस कर तो बहुत बुरा हाल हो गया है। पता नहीं कब छुटकारा मिलेगा। इससे अच्छा तो घर ही चले जाते।" नरेश बड़बड़ाया।"अरे!...क्या खाक घर चले जाते? कोई जाने देता तब ना। सुना नहीं तूने कि बाडर पर ही रोक के रख रहे हैं सब...
"अरे तनेजा जी!...ये क्या?...मैंने सुना है कि आपकी पत्नि ने आपके ऊपर वित्तीय हिंसा का केस डाल दिया है।""हाँ यार!...सही सुना है तुमने।" मैँने लम्बी साँस लेते हुए कहा।"आखिर ऐसा हुआ क्या कि नौबत कोर्ट-कचहरी तक की आ गई?""यार!...होना क्या था?..एक दिन बीवी प्यार ही प्यार...
कई बार हमें पढ़ने के लिए कुछ ऐसा मिल जाता है कि तमाम तरह की आड़ी तिरछी चिंताओं से मुक्त हो, हमारा मन प्रफुल्लित हो कर हल्का सा महसूस करने लगता है मगर कई बार हमारे सामने पढ़ने के लिए कुछ ऐसा आ जाता है कि हमारा मन चिंतित हो, व्यथा एवं वेदनाओं से भर जाता है और ला...
जब कभी आप धीर गंभीर मुद्रा में कोई किताब पढ़ रहे हों और बीच-बीच में ही अचानक पढ़ना छोड़, ठठा कर हँसने लगें  तो आसपास बैठे लोगों का चौंक कर देखना लाज़मी है। ऐसा ही कुछ इस बार हुआ जब मैं प्रसिद्ध व्यंग्यकार सुभाष चंदर जी की किताब "हद कर दी आपने" अपने मेट्रो...
कई बार कुछ कहानियाँ या उपन्यास अपनी भाषा...अपने कथ्य..अपनी रोचकता..अपनी तारतम्यता के बल पर  आपको निशब्द कर देते हैं। उनको पूरा पढ़ने के बाद भी आप उसी कहानी..उसी परिवेश और उन्हीं पात्रों के साथ खुद को उसी माहौल में विचरता पाते हैं। ऐसा ही कुछ मेरे साथ इस बार हुआ...