ब्लॉगसेतु

माना जाता है कि किसी को हँसाना सबसे मुश्किल काम है। इस काम को आसान बनाने के लिए कुछ लोगों द्वारा किसी एक की खिल्ली उड़ा, उसे हँसी का पात्र बना सबको हँसाया जाता है लेकिन यकीन मानिए ऐसे..इस तरह..किसी एक का माखौल उड़ा सबको हँसाने की प्रवृति सही नहीं है। ना ही ऐसे हास्य...
"घुसपैठ"- लघुकथाआज मुझे किसी बुज़ुर्ग रिश्तेदार की श्रद्धांजलि सभा में जाना पड़ा। हँसते खिलखिलाते जब हम वहाँ पर पहुँचे तो औरों की तरह हमारे चेहरे पर भी मुर्दनी छा चुकी थी। सब कुछ सही तरीके से विधिनुसार ठीकठाक चल रहा था, बढ़िया खाना पीना...शोकसंतप्त परिवार, हँसते-खिलखि...
"स्वादानुसार"बुरकना चाहता हूँ मैं तुम्हारे...अद्ध पनपे...अद्ध विकसित..मगर पनपने को आतुर..खिलखिलाते सपनों पर...अपनी पसंद का...नमक और मिर्च..ताकि तुम बन सको...मेरे अनुकूल..मेरे...सिर्फ मेरे...स्वादानुसार
 पोस्ट लेवल : राजीव तनेजा कविता
"सुनो!...रात का वक्त है और पहली बार तुम पर विश्वास कर के तुम्हें अकेला भेज रहे हैं। हमें ग़लत साबित मत करना बेटा।""जी...अब्बू जान।""ध्यान से जाना और किसी से फ़ालतू बात मत करना और अगर कोई कुछ खाने या पीने के लिए भी दे तो बिलकुल मत लेना।""जी!.."और हाँ!...वहाँ उ...
कुछ इस नाज़ औ अंदाज से..ज़ुल्फ़ अपनी लहरा..आप कंधों...
“हद हो गयी यार ये तो बेईमानी की…मुझ…मुझ पर विश्वास नहीं है पट्ठों को….सब स्साले बेईमान….मुझको…मुझको भी अपने जैसा समझ रखा है…एक एक..एक एक पाई का हिसाब लिखा हुआ है मेरे पास…जब चाहो…जहाँ चाहो...लैजर…खाते सब चैक करवा लो…. “क्या हुआ तनेजा जी?…किस पर राशन पानी ले...
“हद हो गयी ये तो एकदम पागलपन की…नासमझ है स्साले सब के सब….अक्ल नहीं है किसी एक में भी…लाठी..फन फैलाए..नाग पर भांजनी है मगर पट्ठे..ऐसे कमअक्ल कि निरीह बेचारी जनता के ही एक तबके को पीटने की फिराक में हाय तौबा मचा…अधमरे हुए जा रहे हैं"… “किसकी बात कर रहे हैं तने...
ट्रिंग ट्रिंग.. “हैलो….कौन बोल रहा है?”.. “डॉक्टर साहब घर पर हैं?”… “हाँ!…जी बोल रहा हूँ…आप कौन?”.. “जी!..मैं शर्मा… “शरमाइए  मत…सीधे सीधे फरमाइए कि…आप हैं कौन?”… “ज्ज…जी!…म्म..मैं… “अब यूँ ही मिमियाते रहेंगे या अपना नाम..पता ठिकाना कुछ बताएँग...
  "हत्या" पढना चाहता हूँ मैं... बड़े प्रेम और लगन से... मंत्रमुग्ध हो.. पन्ना दर पन्ना... तुम्हारे उजले...निष्कलंक..अतीत और... स्वाभीमानी वर्तमान का ताकि भविष्य में तुम्हारे... कभी मैं कर सकूँ... आसानी से...निसंकोच तुम्हारे ही...उजले चरित...
  “पागल हो गए हैं स्साले सब के सब….दिमाग घास चरने चला गया है पट्ठों का…इन्हें तो वोट दे के ही गलती कर ली मैंने…अच्छा भला झाडू वाला भाडू तरले कर रहा था दुनिया भर के लेकिन नहीं..मुझे तो अच्छे दिनों के कीड़े ने काट खाया था ना?..लो!..आ गए अच्छे दिन..अब ले लो वडेवे...