ब्लॉगसेतु

नदियों में नाथशिवनाथ नदी के तीर बसा हुआसूंदर सा गाँव रामपुर,जहाँ पीपल की छांव,मांझी की नाव,नदी तट पर जलक्रीड़ा करती सोन मछरिया,सुंदर साधारण घर-दुवरिया,मंथर जल कोपैरों की छपछपाहट से उकसाती छोरी,महादेव संग बैठी गौरीसब कुछ है इस गाँव रामपुर मेंकलचुरीकाल का त्रिस्तरीय श...
पत्तियाँ पीली हुई पीपल के झाड़ कीबरफ़ पिघलने लगी दोस्तों पहाड़ कीछुट्टा छोड़ दिया किस ने सूरज कोजैसे सांकल खुल गई हो सांड़ कीसुबह से ही लहकने लगी है गरमीसटक गई बेचारे कूलर जुगाड़ कीकट गए सब पेड़ हरियाली है गायबदशा खराब हुई अब गांव गुवाड़ कीत्राहि त्राहि मची पारा भी चढ गयाब...
 पोस्ट लेवल : गजल
नही पढ पाता मैंभावोत्पादक कविताएंसीधे दिल में उतरती हैंऔर निर्झर बहने लगता हैएक एक शब्दअंतर में उतर करबिंध डालता है मुझेआप्लावित दृगदेख नहीं पातेछवि तुम्हारीबिसरने की कल्पना मात्रतार तार कर देती हैजीवन रेखा को
 पोस्ट लेवल : शिल्पकार कविता
तमाम उम्र सफ़र में रहानहीं मैं कभी घर में रहायायावरी पर क्या कहूँकांटो भरी डगर में रहातम्मना-ए-परवाज थीपर उनकी कैद में रहाकह न सका दिल कीपासबां कोई हद में रहामीठे बोल बोलते हैं वोसिर उनकी जद में रहाचलते चलते पहुंचा तोसज्जादों के शहर में रहा
 पोस्ट लेवल : गजल बहर
आज मरने आ खड़ा है रावण मेरे गाँव कालम्बा तगड़ा हट्ठा कट्टा रावण मेरे गाँव काकाले काले बादल झमाझम बरस रहे हैं खूबआसमान से होड़ लेता रावण मेरे गाँव काआतिशबाजी होगी तो धूर में मिल जाएगानेता जी के हाथों मरेगा रावण मेरे गाँव काबारुद भरी देह पर रंग बिरंगे हैं अलंकरणआज नह...
आओ चुनरिया सतरंगी कर दूँ अबकी बार होली मेंआओ प्रीत रंग हजार बिखेर दूं अबकी बार होली मेंजागा है मधुमास मास आजसुगंध लिए ॠतुराज आया कान्हा ने भर ली पिचकारीदेख मन मोरा भी हरसाया लेकर आया हूँ प्रीत अमिट रंग,भरके अपनी झोली मेंआओ चुनरिया सतरंगी कर दूँ अबकी बार ह...
कविताबहुत कठिन हैसमोसे खाने से नहीं आतीपहले यूँ ही आ जाती थीटहलते टहलते कभी भीकागज न हो चादर परलिख लेता चंद लाईने,कभी तकिए के खोल परवो अब मुझसे रुठ गयीदेखकर भी नहीं बोलतीबोलकर भी नहीं देखतीराजा नल के आने परबाल्टी लेकर दौड़ता हूँबिजलीरानी जाने परपैरों से पंखा झलता ह...
 पोस्ट लेवल : मच्छर शिल्पकार कविता
मै अनपढमिला तुमसे तोसीख गया पढनाचेहरे के भावजो सपाट लगते थेस्वयं कह देते हैंबिना कहे हीऔर मैं पढ लेता हूँतुम्हारे अंतरमन  कीसाक्षर हो गया हूँतुम्हारी एक मुस्कानछा जाती है नभ बनकरखामोशी तुम्हारीमेघों में भरा हुआ वर्षा जलगर्भ धारण कर रखा हो उसनेहिरण्यमयी गर्भवर्...
 पोस्ट लेवल : शिल्पकार कविता
महुआ बीनतीवह अनमनी सी लड़कीहँसती है जबझरते हैं फूल, महुआ केमन करता है उसके जूड़े मेंखोंस दूं कुछ फूल टेसू केइस वसंत मेंउसे पहना दूं हारसुर्ख सेमल के फूलों कामहुए के फूल बीनती वहअभिसारिकाजब नदी किनारे बैठ करपैरों से छपछपाती है जलतो उससे बनता है तीरथगढ़धुंआधार जैसा ज...