ब्लॉगसेतु

          (गोंडवाना की महारानी दुर्गावती के उद्यान का दृश्य। महारानी एक सुंदर सरोवर के निकट अन्यमनस्क-सी बैठी हुई हैं। पीछे एक दासी खड़ी है। नेपथ्य से गीत-संगीत और उल्लास की ध्वनियाँ आ रही हैं।) दासी    :    अप...
पीपल का एक पेड़ था। ख़ूब घनेरा। उसकी लंबी और मोटी शाखाएँ दूर तक फैली हुई थीं।पतझर का मौसम आया तो उसके पत्ते पीले होकर झड़ने लगे। पत्तों से भरी घनी डालें तिनकों का जाल होकर रह गईं।सबसे ऊँची डाली पर बचा एक पत्ता टूटकर गिरने से डर रहा था। जब हवा का झोंका आता तो वह थर-थर...
‘‘भैया, मौलवी साहब आ रहे हैं..’’ असद छज्जे से झाँकता हुआ चिल्लाया।हमदान मोबाइल पर गेम खेलने में मगन था। असद की आवाज़ ने रंग में भंग कर दिया, पर उसने अपनी निगाह मोबाइल पर गड़ाए रखी।‘‘भैया...मौलवी साहब आ गए हैं...!!’’ असद ने एक-एक शब्द पर ज़ोर देकर दोबारा कहा।‘‘आ गए...
 पोस्ट लेवल : बाल कहानी कहानी
मियाँ मुनक्का रोज़ की तरह हकीम किशमिश के दवाख़ाने पहुँचे तो वह बेचैनी से टहलक़दमी कर रहे थे। मियाँ मुनक्का को देखते ही लपककर आए और दोनों कंधे थामते हुए बोले, ‘‘आ गए दोस्त! मैं बड़ी देर से तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था।’’मियाँ मुनक्का हैरान रह गए। और दिनों में जब वह चाय...
एक बार मशहूर लेखक मूरखमल ‘अज्ञानी’ ने एक किताब लिखने की सोची, जिसमें दुनिया भर के मूर्खों के क़िस्से हों। वह बहुत दिनों से चाह रहे थे कि अपनी बिरादरीवालों के लिए कुछ ऐसा कर जाएँ, जिससे ज़माना याद करे। उन्होंने किताब का नाम भी सोच रखा था-‘मूर्खों की महागाथा’। दुनिया भ...
सहन में पैर रखते ही मियाँ मुनक्का को जैसे चक्कर आ गया। अभी-अभी तिपाई पर चार मोटी-ताज़ी मूलियाँ रखी थीं। पर अब सिवा डंठलों के वहाँ कुछ भी नहीं दिख रहा था। उस पर तुर्रा यह कि पास में पहलवान पिस्ता का बकरा बेफिक्री से जुगाली किए जा रहा था।मियाँ मुनक्का का दिल बैठ गया।...
(अहमद नगर का राज्य। दरबार लगा हुआ है। चाँदबीबी अपने दरबारियों के साथ बैठी हुई हैं। उनके चेहरे पर शोक की छाया विद्यमान है। दरबारियों के सिर झुके हुए हैं। कुछ क्षणों के बाद वज़ीर उठकर बोलता है।) वज़ीर   : बेगम साहिबा, हुज़ूरे-आला की जन्नत-परवाज़ के बाद सारी रि...
राघव बाबा बरामदे में लेटे उचाट भाव से दूर खेतों में हवा की अटखेलियाँ देख रहे थे। बाहर सारी प्रकृति जैसे अद्भुत उल्लास में डूबी हुई थी। सरसों के खेतों में फैली पीली चादर फरवाई से डोल-डोल जाती थी। गेहूँ और जौ के खेतों से गुज़रती हवा खनखनाकर हँस पड़ती थी। सूरज की सुनहरी...
 पोस्ट लेवल : बाल कहानी बसंत पंचमी
मसूर की दाल जैसा सूरज जब साँझ को पेड़ों के पीछे उतरने लगता है तो उसमें न गरमी रह जाती है, न रोशनी। यही समय होता है जब हरचरन अपने मवेशियों को हाँकता हुआ गाँव वापस लौट चलता है। उसके पास एक बैल है और दो गाएँ। तीनों मवेशी सुंदरा ताई के हैं। ताई उसकी कोई नहीं, पर अपनों...
गर्मी अपने यौवन पर थी। सूरज से जैसे आग बरस रही थी। लू के थपेड़ों से धरती तवा बनी हुई थी। धूल के बवंडर रह-रहकर आसमान को मटमैला कर देते थे। शहर की ओर जानेवाली सड़क पर दूर-दूर तक सन्नाटा छाया हुआ था। मास्टर छोटेलाल पाकड़ के पेड़ के नीचे खड़े बस का इंतज़ार कर रहे...