ब्लॉगसेतु

बिन्नू के दादा जी को भूलने की बड़ी बीमारी है। दादी उनसे सेब लाने को कहती हैं और वे संतरे ले आते हैं। दादी टोकती हैं तो हँसकर कहते हैं-‘‘इस बार संतरों से काम चला लो, सेब अगली बार ला दूँगा।’---और जब अगली बार जाते हैं तो अमरूद उठा लाते हैं।उनकी इस आदत से परेशान होकर द...
 पोस्ट लेवल : हास्य बाल कहानी
     रात का पहला पहर। झेलम का विस्तृत तट घने अंधकार में विलीन होकर भयावह हो रहा था। बादल घिरे होने के कारण अंधकार गाढ़ा होकर झुका आता-सा लगता था। हवा एकदम ठप थी। पूरे वातावरण में एक आशंका-सी तैर रही थी। बादलों का गर्जन जैसे किसी अनिष्ट की घोषणा क...
 पोस्ट लेवल : ऐतिहासिक बाल कहानी
इस बार मैंने सोच रखा था कि पूरी छुट्टी नानी के घर मौज-मस्ती में बिताऊँगा, पर क़िस्मत की ऐसी मार कि वहाँ जाते ही बीमार पड़ गया। बीमार भी ऐसा कि पूरा महीना बिस्तर पर गुज़रा। हकीम साहब ने बताया कि मियादी बुख़ार है। हकीम साहब यानी हमारे नाना। हालाँकि उनका नाम मौलवी हबीबुर्...
मेरी बाल कहानियाँ : निक्की को न मत कहना
‘‘पापा...कहाँ हैं आप?’’ निक्की की आवाज़ पाते ही पापा हड़बड़ा गए। पाँच मिनट पहले निक्की ने चाय का कप लाकर उनकी मेज़ पर रखा था। वह अब भी वैसे का वैसा रखा था। पापा की आदत ऐसी थी कि काम में उलझते तो होश न रहता। पर निक्की भी घर की दारोग़ा है। उसके रहते कुछ भी गड़बड़ नहीं हो सक...
 पोस्ट लेवल : बाल कहानी
होली का दिन नज़दीक आता जा रहा था। मुहल्ले के बच्चों में काफी उत्साह था। नीरज, सलीम, मंजीत और डेविड सभी रोज़ शाम को नीरज के दादा जी के पास जा पहुँचते और होली के बारे में ढेर सारी बातें करते। दादा जी भी रस ले-लेकर उनकी बातें सुनते। नीरज और मंजीत ने पहले से ही रंग और पि...
 पोस्ट लेवल : बाल कहानी कहानी
हमारे गाँव में बहुत से लोग थे। एक थे रहमत अली। नाम के बिल्कुल उल्टे। चेहरे पर ऐसा ताव जैसे हर वक़्त लड़ने को तैयार बैठे हों, और एक थे संतोषी काका, सपने में भी निन्यानबे के फेर में पड़े रहते थे। बहादुर कक्का ऐसे कि चूहे से भी डर जाएँ और बलवीर चाचा के लिए लाठी टेके बिन...
(जैसलमेर के राजा महारावल रत्नसिंह का दरबार। राजकुमारी रत्नावती मंत्री के साथ बैठी विचार-विमर्श कर रही हैं।)रत्नावती      ःमंत्री जी, राज्य में सब कुशल तो है?मंत्री        ःजी, राजकुमारी, आप की कृपा से सब कुशल है। सब...
महर्षि उद्दालक अपनी कुटी के सामने स्वच्छ चबूतरे पर बैठे हुए थे। बालक अष्टावक्र उनकी गोद में विराजमान था। अष्टावक्र के अंग जन्म से टेढ़े-मेढ़े थे। दैनिक जीवन-चर्या में उसे बहुत कठिनाई होती थी। आश्रम के अन्य बालकों के समान वह खेल-कूद नहीं सकता था। उसकी इस विकलता के कार...
जब हर कहीं रामलीला समाप्त हो जाती है, तब बच्चों की असली रामलीला शुरू होती है। पतली कमची को मोड़कर दोनों सिरे धागे से बाँध लिए, धनुष तैयार हो गया। पतली-पतली सिरकियाँ ले लीं, बाण बन गए। बस, सेना लेकर निकल पड़े लंका-विजय के लिए।यही हाल काशीपुर का था। इधर गाँव की रामलीला...