ब्लॉगसेतु

फिरूँ यत्र-तत्र मैं तृषित अधर हे कली-आली! मैं श्याम भ्रमर मैं सब चितवन से दूर, श्रांत अपने गह्वर में मैं विस्मृत था, बेनूर, छिपा इस जग-चर्चर में जब दहक रही थी अग्नि मृदा में, और पवन में हो क्षुधा-त्रस्त, मैं धधक रहा था अपने उदर में    जब बरस रहे थे म...
घन घनघोर घिरे अंबर जड़ संभल हुआ तुरत सत्वर ढन ढनन ढनन गूंजा चहुँओर बिजली कड़की फिर मचा शोर कृषको ने सोचा आ ही गयी और बैठ गए धर हाथ-पाथ संचित शंका का हो विनाश कुछ मेह फटे, हो सलिलपात पर नियति की लीला ऐसी, वो धरा हाथ फिर मलता है जब हवा का झोंका चलता है. सन सनन-सनन, सन...
तुम्हारे शब्द ध्वनिमात्र थे या खून का रिसता दरिया पता नहीं चल पाया कि तुम्हारे आत्मा की आवाज़ या तुम्हारे सिगरेट का का धुंआ इसी व्योम की अप्रतिबंधित यात्रा को निकले थे ( बस  निकल कर विलीन होने को)बहुत अँधेरे में जीते थे तुम (और तुम्हारी फूलन देवी)प्रेम शब्द जीव...
तुमने मुझे खून दिया मैंने तुम्हारा खून लिया तुमने मुझे खून से सींचा और मैंने चाक़ू मुट्ठी में भींचाशब्द नवजात की तरह नंगे हो गए बस अफवाह पर दंगे हो गए परकीया के हाथ पर बोला तोता तुमने ही चूड़ियाँ बजाई, तुमने ही खेत जोता झंडे पर शार्दूल, ह्रदय  में मार्जार रसूलनब...
ये कैसा बंधन जिसमे तुम घने घन की तरह उठकर मुझमे ही प्रस्तारित हो गिरती तेज झोंके की तरह स्निघ्ध स्नेह सलिल बनकर भिंगोती  बाहर अंदर ये कैसा बंधन जिसमे तुम मदमाती सुवास बन आती हो शिराओं में स्थान बनाकर  हर स्पन्दन संग बहती जाती होमेरे ही मुस्कानों में मुस्क...
मैं बंधा उस डोर से जिस डोर में तुम बंध गए तोक्या ये अंबर, क्या ये चिलमन क्या ये उपवन, क्या ये निर्जन क्या ये बादल, क्या ये शीतलक्या गगन ये खाली-खाली क्या गिरि के तुंग पर बैठे हुए से, पूछता है ये सवाली तुम बताओ! तुम बताओ क्यों भला इस डोर के दो छोर को मिलने ना दोगे क...
नाच उठा है मोर कि बादल आये हैं यही बात सब ओर कि बादल आये हैसुरमई है हर एक किनारा अम्बर का  बिजली ढन-ढन शोर कि बादल आये हैं वो आँसूं भी सूख चुके हैं तप-तपकर  ढलके थे जो कोर कि बादल आये हैं बाँध लिया है झूला मेरे प्रियतम नेचला मैं सारा छोड़ कि बादल आये हैंपौ...
उन्हीं कणों का मैं एक वाहक जिसमे रच बस गए हजारोंजिसमे बस फंस गए हजारों उन्हीं कणों का मैं एक वाहक मदिर पिपासा लिए हिमालय से चल पहुंचा सिन्धु की छोर छोर मिला ना, सलिल-बूँद! हाँ चला हूँ अब अरावली की ओर पर एक पिपासा, मदिर पिपासामेरी साकी, मेरा सांप मेरा समतल, मेरा चाँ...
बाइबल से निकले हुए भाव थे शायद-“गॉड कैननॉट गिव यू मोर दैन यू कैन टेक”कर्ण-विवरों में आशा की ध्वनियाँ कोठे पर नाचनेवाली की पायल अक्सर, अच्छी लगती है- बहुत अच्छी और साथ ही यह भी-“व्हाटऐवर हैप्पेंस, हैप्पेंस फॉर द बेस्ट”जुमले नहीं है येसिद्धहस्तों के सूत्र हैं-जीवन सू...
कई महीनों  से 'ग़ज़ल' लिख पाना संभव नहीं हो पाया. ग़ज़ल की पूरी समझ अभी भी नहीं है मुझे. रदीफ़ और काफियाबंदी जरूर कर लेता हूँ अब. लेकिन बहर के लिए शायद किसी उस्ताद का शागिर्द बनना होगा.  नज़ाकत और नफ़ासत के लिए खासकर.   अभी एक नयी 'ग़ज़ल' लिखी है.  नया न...