ब्लॉगसेतु

इस लंबी सी ख़ामोशी के बाद....ऐ-री-सखी ,बता ना मुझे किएक लंबी सी खामोशी के बादयूँ तेज़ तूफ़ान का आनाऔर मेरा यूँ चेतन विहीन हो जानाऔर सोचना कि ,क्यों हर तूफ़ान अपने बादबर्बादी का मंज़र छोड़ जाता हैदरख्त टूटे ,मकां *उजड़*और आँखों से बहते आँसूकिसकी कहानी बयाँ करते हैं |ऐ-री-स...
फेसबुक पर एक लेखक वर्ग ऐसा है जो हम जैसी घरेलू लेखिकाओं से बहुत डरता है क्योंकि हमारा लिखा (चाहे थोडा लिखें) तारीफ़ पाता है |ज्यादा की चाह के बिना हम अपना काम निरंतर करते रहने में विश्वास रखती हैं , इसी लिए हमारे मित्र और नए जुड़ने वाले दोस्त अपने आप से हमारे लिखे को...
नीता कोटेचा''नित्या''Neeta Kotecha की लिखी गुजरती कहानी....''बेटे की ख़्वाहिश''जिसका अनुवाद मैंने किया है उस कहानी को कनाड़ा से प्रकाशित पत्रिका ''प्रयास'' में स्थान देने के लिए सरन जी का आभार****************************ये गुजराती कहानी कुछ इस तरह है ...." नही हमीद ,...
‘’ये अमीरों की जमात भी बड़ी अजीब सी होती हैं |इन लोगों की हर बात आम इन्सानों से अगल ही होती है|घर के रहन सहन, उनके कपड़े, उनके घर के झगड़े, जैसे हिन्दी सीरियल में दिखाये जाते हैं उनसे एक दम अलग .....यहाँ इन घरों में कोई ऊँची आवाज़ में बात नहीं करता |दो-चार गालियाँ इंग्...
तेरह साल का परेश रंगमंच के हॉल की सफाई किया करता था |वहाँ रोज़ कोई ना कोई साहित्य से जुड़ा बड़े नाम का व्यक्ति आता ही रहता था |इसी के चलते परेश के दिमाग में नित-नई कहानी/कविता जन्म लेती ही रहती थी तो वो सब अपनी कॉ...
इन आड़ी-तिरछी लकीरों सेखींचती है ज़िंदगी एक तस्वीरएक सोचएक द्वंद्धएक लड़ाई इस बेरहम जिंदगी सेएक सोचउस खालीपन की कसककुछ तो करना हैजो अभी अधूरा हैएक जद्धोजहदउस खालीपन कीजिसके इंतज़ार मेंउम्र निकलती जा रही हैखाली से टेबल परखाली से वक़्त मेंकागज़,पेंसिल से खेलने की कलाज...
 माँ शब्द एक  पर,खुद में सम्पूर्ण माँ कैसे जान लेती है दिल की हर बात  हर जज़्बात को जीवन चक्र शैशव से यौवन तक के सफर को और आँखों में झलकते किसी के प्यार को माँ शांत, सौम्य पर दिल से धरती सी म...
चहल-पहल की इस नगरी में हम तो निपट बेगाने है जपते राम नाम सदा हम उसी के दीवाने है बेगानों की इस दुनिया में सजे बाज़ार मतवालों के हैं छीन ले जो खुशियाँ सभी ऐसे दुश्मन भी  नहीं बनाने हैं भूल कर सब बैठे घर अपना ऐसे यहाँ...
उसकी आखिरी रात में साँसों का चलना और साँसों का रुकना इसी के बीच रुक-रुक के चलती जिंदगी पर वो जिंदगी की आखिरी रात सो कर नहीं बिताना चाहती वो भूल जाना चाहती है  कि वो एक औरत है एक स्त्री, एक माँ है एक ब...
जानती हूँ कि मैं कोई नई बात नहीं लिख रही हूँ ....पर आज जब हल्ला बोल प्रोग्राम देखा तो एक सोच मन में उठी और उसी सोच को बस शब्द देने का प्रयास किया हैटीवी पर आने वाले कार्यक्रम, खासकर सास-बहु टाइप प्रोग्राम से अब ऊब चुकी हूँ | इन बेकार के प्रोग्राम का...