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पेशे से अध्यापक और मिजाज़ से कवि आशीष ने कविता से अधिक नाम आलोचना में कमाया है. लेकिन इस नाम कमाने में बेहतर या बदतर लिखा जाना नहीं शामिल, मुझे तो वे हमेशा मूलतः कवि लगे हैं, यह अलग बात है कि कवि होने के लिए कविता लिखने से इतर जो शर्तें हैं शायद वह उन पर उतना खरे नह...
 पोस्ट लेवल : आशीष त्रिपाठी
“कविता मुझे हमेशा वेदिका से पादरी की आवाज़ जैसी लगती थी...पंछियों को गाने दो” – निकानोर पार्रा  ने कभी कविता के बारे में ये शब्द कहे थे. पार्रा का मानना था कि राजनीतिक व भावनात्मक शैली के बदले कविता में बोलचाल की भाषा, व्यंग्य और विसंगति होनी चाहिए.पार्रा जब च...
कविता के पाठक नेरूदा से ख़ूब परिचित हैं. हिन्दी में उनके अनुवाद पहले भी ख़ूब हुए हैं. उज्ज्वल भट्टाचार्य के ये अनुवाद उनकी कविता के कुछ और वातायन खोलते हैं. अगर तुम मुझे भूल जाओमैं चाहता हूँ तुम्हें पता हो यह बात.तुम्हें पता है बात कैसी है : जब मैंचमकते चाँद, या...
भूख और सपनों के बीच भूख के भेष में जिंदगीऔर जिंदगी की शक्ल में सपने चलते रहें हैं हमारे साथ और हम चलने के नाम पर ठहरे रहे हैं कहीं भूख और सपनों के बीच उजाले के भरम में अँधेरे को चुना है हर बार, बार बारऔर एक गीत&nbsp...
कविताओं में जीने वालीं सुमन जी ने इधर उन्होंने कोई एक कविता चुनकर उस पर विस्तार से लिखना शुरू किया है जो हिन्दी की आत्मग्रस्ति से समीक्षाग्रस्ति  तक सिमटी दुनिया में अनूठा सा काम है. चाहूँगा इस आपाधापी और कमेन्ट-लाइक की भागदौड़ से आगे ज़रा ठहर कर पढ़ा जाए.लेख के...
स्वप्निल श्रीवास्तव नब्बे के दशक के उन कवियों में हैं जिनकी कविता का भावबोध एक तरफ़ अस्सी के दशक से सीधे जुड़ता है तो दूसरी तरफ़ अपने लिए एक बिलकुल नया काव्य संसार गढ़ता है. जीवन के बेहद मामूली लगाने वाले अनुभवों को अपनी कविताई से विराट बिम्ब में बदल देने की अपनी अद्भु...
ओक्टोवियो पाज़  सड़कएक लम्बी और सुनसान सड़क. अंधकार में चलता जाता हूं और लड़खड़ाता हूं और गिर जाता हूं और उठ खड़ा होता हूं, और अंधे सा चलता जाता हूं, मेरे क़दम ख़ामोश पत्थरों और सूखे पत्तों को कुचलते हैं. मेरे पीछे भी कोई कुचलता है, पत्थरों , पत्तों को : अ...
सीरिया विश्व मानचित्र पर एक घाव सा है या बेहतर होगा यह कहना कि सीरिया मनुष्यता की देह पर एक घाव सा है. मराम अल-मासरी की कविताएँ उन घावों और खरोंचों को उनकी पूरी तल्खी के साथ अपनी कविताओं में ले आती हैं तो देवेश ने अपने अनुवादों से उन्हें हिन्दी के पाठक तक लाते हुए...
युवा कथाकार अनघ शर्मा का पहला कहानी संकलन "धूप की मुंडेर" अभी हाल ही में राजकमल प्रकाशन से आया है. उसी संकलन से एक कहानी. “डाल दिया रे पानी पे बिछौना,किसने किया रे ये पानी पे बिछौनाससुर हमारे चौधरी,सास बड़ी तेताल,हाय- हाय- हाय दिन रात लड़े हैडाल दिया रे पानी पे...
हिन्दी कविता की दुनिया का तो नहीं पता लेकिन आलोचना की दुनिया 'प्रतिबद्ध' और 'कलावाद' की एक अबूझ बायनरी और दोनों ही पदों की एक भ्रष्ट समझ से बनती है अक्सर. कला की उपस्थिति को कलावाद मान लेने का एक असर यह हुआ कि कुछ कवि और अधिक कला की खोल में छिपते चले गए और कुछ कवि...
 पोस्ट लेवल : मृत्युंजय