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पिछली सदी के आरम्भ में अमेरिका में के समृद्ध व्यापारिक घर जन्मीं ऐनी सैक्सटन, एक असाधारण कवयित्री हैं। उनकी कविताओं को  confessional verse, स्टाइल की कविता कहा गया जिसमें उनके निजी और सामजिक  जीवन की त्रासदी साफ़ तौर पर दिखाई देती है. हालाँकि उनकी कविताएँ...
मनीषा श्रीवास्तव उन अर्थों में कवि नहीं हैं जिनमें होना आजकल ज़रूरी हो गया है. मतलब सोशल मीडिया पर उनकी वाल पर आपको प्रकाशन/आयोजन आदि की सूचनाएँ नहीं मिलेंगी. लेकिन उन्हें पढ़ते हुए आप उस कवि हृदय की भी थाह पा सकते हैं और बेकली की भी जो कविता लिखने के सबसे ज़रूरी औज़ा...
नॉटनल डॉट कॉम (notnul.com) एक तरह का नवोन्मेष है जहाँ इसके कर्ता-धर्ता नीलाभ श्रीवास्तव हिन्दी की महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं के साथ किताबें भी सॉफ्ट वर्ज़न में ला रहे हैं और बेहद कम दामों में युवा पीढ़ी को उनके मोबाइल्स और लैपटॉप पर हिन्दी का श्रेष्ठ साहित्य उपलब्ध करा र...
नेपाली युवा कवयित्री सरिता तिवारी पेशे से शिक्षक और अधिवक्ता हैं और कविताओं के अलावा वहाँ के राष्ट्रीय दैनिक कान्तिपुर के लिए नियमित कॉलम लिखती हैं. प्रलेसं से जुडी सरिता जी के नेपाली में दो कविता संकलन आ चुके हैं और अभी उनका एक संकलन हिन्दी में अनुदित होकर "सवालों...
पेशे से अध्यापक और मिजाज़ से कवि आशीष ने कविता से अधिक नाम आलोचना में कमाया है. लेकिन इस नाम कमाने में बेहतर या बदतर लिखा जाना नहीं शामिल, मुझे तो वे हमेशा मूलतः कवि लगे हैं, यह अलग बात है कि कवि होने के लिए कविता लिखने से इतर जो शर्तें हैं शायद वह उन पर उतना खरे नह...
 पोस्ट लेवल : आशीष त्रिपाठी
“कविता मुझे हमेशा वेदिका से पादरी की आवाज़ जैसी लगती थी...पंछियों को गाने दो” – निकानोर पार्रा  ने कभी कविता के बारे में ये शब्द कहे थे. पार्रा का मानना था कि राजनीतिक व भावनात्मक शैली के बदले कविता में बोलचाल की भाषा, व्यंग्य और विसंगति होनी चाहिए.पार्रा जब च...
कविता के पाठक नेरूदा से ख़ूब परिचित हैं. हिन्दी में उनके अनुवाद पहले भी ख़ूब हुए हैं. उज्ज्वल भट्टाचार्य के ये अनुवाद उनकी कविता के कुछ और वातायन खोलते हैं. अगर तुम मुझे भूल जाओमैं चाहता हूँ तुम्हें पता हो यह बात.तुम्हें पता है बात कैसी है : जब मैंचमकते चाँद, या...
भूख और सपनों के बीच भूख के भेष में जिंदगीऔर जिंदगी की शक्ल में सपने चलते रहें हैं हमारे साथ और हम चलने के नाम पर ठहरे रहे हैं कहीं भूख और सपनों के बीच उजाले के भरम में अँधेरे को चुना है हर बार, बार बारऔर एक गीत&nbsp...
कविताओं में जीने वालीं सुमन जी ने इधर उन्होंने कोई एक कविता चुनकर उस पर विस्तार से लिखना शुरू किया है जो हिन्दी की आत्मग्रस्ति से समीक्षाग्रस्ति  तक सिमटी दुनिया में अनूठा सा काम है. चाहूँगा इस आपाधापी और कमेन्ट-लाइक की भागदौड़ से आगे ज़रा ठहर कर पढ़ा जाए.लेख के...
स्वप्निल श्रीवास्तव नब्बे के दशक के उन कवियों में हैं जिनकी कविता का भावबोध एक तरफ़ अस्सी के दशक से सीधे जुड़ता है तो दूसरी तरफ़ अपने लिए एक बिलकुल नया काव्य संसार गढ़ता है. जीवन के बेहद मामूली लगाने वाले अनुभवों को अपनी कविताई से विराट बिम्ब में बदल देने की अपनी अद्भु...