ब्लॉगसेतु

ॐ भोजपुरी भाषा और बोली पर्व....................................परिचर्चा के मुख्य बिंदु ःः(1)- भोजपुरी बोली का भौगोलिक क्षेत्र - 1-आ.रंजना सिंह जी 2-मगही बोली का भौगोलिक क्षेत्र एवं साहित्य - आ.पूनम कतरियार जी(3)- उद्भव एवं विकास - आ.संगीत सुभाष पांडे जी(4...
 पोस्ट लेवल : भोजपुरी पर्व
सरस्वती वंदना बृज भाषा *सुरसती मैया की किरपा बिन, नैया पार करैगो कौन? बीनाबादिनि के दरसन बिन, भव से कओ तरैगो कौन?बेद-पुरान सास्त्र की मैया, महिमा तुमरी अपरंपार-तुम बिन तुमरी संतानन की, बिपदा मातु हरैगो कौन?*धरा बरसैगी अमरित की, माँ सारद की जै कहियौ नेह नरमदा बन जीव...
 सरायकी हाइकु *लिखीज वेंदेतकदीर दा लेखमिसीज वेंदे*चीक-पुकारदिल पत्थर दापसीज वेंदे*रूप सलोनामेडा होश-हवासवजीज वेंदे*दिल तो दिलदिल आख़िरकारबसीज वेंदे*कहीं बी जातेबस वेंदे कहीं बीलड़ीज वेंदे*दिल दी माड़ीजे ढे अपणै आपउसारी वेसूं*सिर दा बोझतमाम धंधे धोकेउसारी वेसूं*सा...
पुस्तक चर्चा: कालजयी छंद दोहा का मणिदीप "दोहा दीप्त दिनेश"चर्चाकार: प्रो. नीना उपाध्याय *आदर्शोन्मुखता, उदात्त दार्शनिकता और भारतीय संस्कृति की त्रिवेणी के पावन प्रवाह, सामाजिक जागरण और साहित्यिक सर्जनात्मकता से प्रकाशित मणिदीप की सनातन ज्योति है विश्ववाण...
लघुकथा:ठण्ड *संजीव बाप रे! ठण्ड तो हाड़ गलाए दे रही है। सूर्य देवता दिए की तरह दिख रहे हैं। कोहरा, बूँदाबाँदी, और बरछी की तरह चुभती ठंडी हवा, उस पर कोढ़ में खाज यह कि कार्यालय जाना भी जरूरी और काम निबटाकर लौटते-लौटते अब साँझ ढल कर रात हो चली है। सोचते हुए उ...
 पोस्ट लेवल : लघुकथा ठण्ड
मुक्तक जब तक चंद्र प्रकाश दे जब तक है आकाश। तब तक उद्यम कर सलिल किंचित हो न निराश।।*रौंद रहे कलियों को माली, गईँ बहारें रूठ।बगिया रेगिस्तान हो रहीं, वृक्ष कर दिए ठूँठ।।*जग उठ चल बढ़ गिर मत रुक ठिठक-झिझिक मत, तू मत झुक। उठ-उठ कर बढ़, मंजिल तक-'सलिल' सतत चल, कभी न चु...
 पोस्ट लेवल : मुक्तक
पुस्तक चर्चा-'सच कहूँ तो' नवगीतों की अनूठी भाव भंगिमाआचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'*[पुस्तक विवरण- सच कहूँ तो, नवगीत संग्रह, निर्मल शुक्ल, प्रथम संस्करण २०१६, आकार २१.५ से.मी. x १४.५ से.मी., आवरण बहुरंगी, सजिल्द जैकेट सहित, पृष्ठ ९६, मूल्य २५०/-, उत्तरायण प्रकाशन, के ३९...
 नवगीत:पेशावर के नरपिशाचधिक्कार तुम्हें.दिल के टुकड़ों से खेली खूनी होलीशर्मिंदा है शैतानों की भी टोलीबना न सकते हो मस्तिष्क एक भी तुममस्तिष्कों पर मारी क्यों तुमने गोली?लानत जिसने भेजकिया लाचार तुम्हें.दहशतगर्दों! जिसने पैदा किया तुम्हेंपाला-पोसा देखे थे सुख...
 पोस्ट लेवल : नवगीत पेशावर
 नवगीत: बस्ते घर से गए पर लौट न पाये आज बसने से पहले हुईं नष्ट बस्तियाँ आज . है दहशत का राज नदी खून की बह गयी लज्जा को भी लाज इस वहशत से आ गयी गया न लौटेगा कभी किसको था अंदाज़?. लिख पाती बंदूक कब सुख का इतिहास?थामें रहें उलूक पा-देते हैं त्रास रहा चरागों के तले...
 पोस्ट लेवल : नवगीत