ब्लॉगसेतु

शिवमय दोहे *डिम-डिम डमरू-नाद है, शिव-तात्विक उद्घोष.अशुभ भूल, शुभ ध्वनि सुनें, नाद अनाहद कोष..डमरू के दो शंकु हैं, सत्-तम का संयोग.डोर-छोर श्वासास है, नाद वियोगित योग..डमरू अधर टँगा रहे, नभ-भू मध्य विचार.निराधार-आधार हैं, शिव जी परम उदार..डमरू नाग त्रिशूल शशि, बाघ-...
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एक गीत  :*नूराकुश्ती खेल रहे होदेश गर्त में ठेल रहे हो *तुम ही नहीं सयाने जग में तुम से कई समय के मग में धूल धूसरित पड़े हुए हैं शमशानों में गड़े हुए हैं अवसर पाया काम करो कुछ मिलकर जग में नाम करो कुछ रिश्वत-सुविधा-अहंकार ही झिल रहे हो, झेल रहे हो नूराकुश्त...
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*कुंडलिया वादे कर जो भुला दे, वह खोता विश्वास.ऐसे नेता से नहीं, जनता को कुछ आस.जनता को कुछ आस, स्वार्थ ही वह साधेगा.भूल देश-हित दल का हित ही आराधेगा.सलिल कहे क्यों दल-हित को जनता पर लादे.वह खोता विश्वास भला दे जो कर वादे १९-१२-२०१७ *शिवमय दोहे ल...
 शिवमय दोहे लोभ, मोह, मद शूल हैं, शिव जी लिए त्रिशूल.मुक्त हुए, सब को करें, मनुज न करना भूल..जो त्रिशूल के लक्ष्य पर, निश्चय होता नष्ट.बाणासुर से पूछिए, भ्रष्ट भोगता कष्ट..तीन लोक रख सामने, रहता मौन त्रिशूल.अत्याचारी को मिले, दंड हिला दे चूल..जर जमीन जोरू 'सल...
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कुण्डलियाकार्य शाला**कुंडलिया वादे कर जो भुला दे, वह खोता विश्वास.ऐसे नेता से नहीं, जनता को कुछ आस.जनता को कुछ आस, स्वार्थ ही वह साधेगा.भूल देश-हित दल का हित ही आराधेगा.सलिल कहे क्यों दल-हित को जनता पर लादे.वह खोता विश्वास भला दे जो कर वादे १९-१२-२०१७ तन की मनहर बा...
तीन काल खंड तीन लघु कथाएँ : १. जंगल में जनतंत्र जंगल में चुनाव होनेवाले थे।मंत्री कौए जी एक जंगी आमसभा में सरकारी अमले द्वारा जुटाई गयी भीड़ के आगे भाषण दे रहे थे।- ' जंगल में मंगल के लिए आपस का दंगल बंद कर एक साथ मिलकर उन्नति की रह पर कदम रखिये। सिर्फ़ अ...
लघुकथा - समरसता *भृत्यों, सफाईकर्मियों और चौकीदारों द्वारा वेतन वृद्धि की माँग मंत्रिमंडल ने आर्थिक संसाधनों के अभाव में ठुकरा दी।कुछ दिनों बाद जनप्रतिनिधियों ने प्रशासनिक अधिकारियों की कार्य कुशलता की प्रशंसा कर अपने वेतन भत्ते कई गुना अधिक बढ़ा लिये।अगली...
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 मुक्तक चोट खाते हैं जवांदिल, बचाते हैं और कोखुद न बदलें, बदलते हैं वे तरीके-तौर को मर्द को कब दर्द होता, सर्द मौसम दिल गरम आजमाते हैं हमेशा हालतों को, दौर को ९.१२.२०१६ ***शब्दों का जादू हिंदी में अमित सृजन कर देखो नाछन्दों की महिमा अनंत है इसको भी तुम लेखो ना...
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 दोहा दुनिया *आलम आलमगीर की, मर्जी का मोहताजमेरे-तेरे बीच में, उसका क्या है काज?*नयन मूँद देखूं उसे, जो छीने सुख-चैन गुम हो जाता क्यों कहो, ज्यों ही खोलूँ नैन* पल-पल बीते बरस सा, अपने लगते गैरखुद को भूला माँगता, मन तेरी ही खैर *साया भी अपना नहीं, दे न तिमिर मे...
 पोस्ट लेवल : दोहा दुनिया
नवगीत:जिजीविषा अंकुर कीपत्थर का भी दिलदहला देती है*धरती धरती धीरजबनी अहल्या गुमसुमबंजर-पड़ती लोग कहेंताने दे-देकरसिसकी सुनता समयमौन देता है अवसरहरियाती है कोखधरा हो जाती सक्षमतब तक जलती धूपझेलकर घाव आपसहला लेती है*जग करता उपहासमारती ताने दुनियापल्लव ध्यान न देतेकोशि...
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