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लघुकथा: जंगल में जनतंत्र -आचार्य संजीव 'सलिल'*जंगल में चुनाव होनेवाले थे।मंत्री कौए जी एक जंगी आमसभा में सरकारी अमले द्वारा जुटाई गयी भीड़ के आगे भाषण दे रहे थे।- ' जंगल में मंगल के लिए आपस का दंगल बंद कर एक साथ मिलकर उन्नति की रह पर कदम रखिये। सिर्फ़ अपन...
द्विपदियाँ - दोहे चाँद संजीव *सुबह के इन्तिज़ार में बेकल चाँदनी रात चाँद साथ लिए *चाँद आकाश में घूँघट में भी कौन ज्यादा हसीन?; कौन कहे?*चाँद ने चाँद में चेहरा देखा खोपड़ी आइना है मान लिया *चाँद पर चाँद हाथ फेर रहा चाँद खिड़...
 पोस्ट लेवल : चाँद दोहे द्विपदियाँ
मुक्तिका *जो है अपना, वही पराया है? १८  ठेंगा सबने हमें बताया है     १८ *वक्त पर याद किया शिद्दत से १७ बाद में झट हमें भुलाया है *पाक दामन जो कह रहा खुदको पंक में वह मिला नहाया है *जोड़ लीं दौलतें ज़माने ने अंत में सं...
 पोस्ट लेवल : मुक्तिका
मुक्तक सलिला:शब्दों का जादू हिंदी में अमित सृजन कर देखो नाछन्दों की महिमा अनंत है इसको भी तुम लेखो ना पढ़ो सीख लिख आत्मानंदित होकर सबको सुख बाँटोमानव जीवन कि सार्थकता यही 'सलिल' अवरेखो ना*नारी अबला हो या सबला, बला न उसको मानो रेदो-दो मात्रा नर से भारी, नर से बे...
एक रचनाघुटना वंदन*घुटना वंदन कर सलिल, तभी रहे संजीव।घुटने ने हड़ताल की, जीवित हो निर्जीव।।जीवित हो निर्जीव, न बिस्तर से उठने दे।गुड न रेस्ट; हो बैड, न चलने या झुकने दे।।छौंक-बघारें छंद, न कवि जाए दम घुट ना।घुटना वंदन करो, किसी पर रखो न घुटना।।*मेदांता अस्पताल दिल्ली...
दोहा सलिला सबखों कुरसी चाइए,बिन कुरसी जग सून.राजनीति खा रई रे, आदर्सन खें भून.*करें वंदना शब्द की ले अक्षर के हार सलिल-नाद सम छंद हो, जैसे मंत्रोच्चार*पौधों, पत्तों, फूल को, निगल गया इंसानमैं तितली निज पीर का, कैसे करूँ बखान?*मन में का? के से कहें? सुन हँ...
 पोस्ट लेवल : दोहा द्विपदी मुक्तक
क्षणिका *बहुत सुनी औरों की अब तो मनमानी कुछ की जाए.दुनिया ने परखा अब तक अब दुनिया भी परखी जाए *http://divyanarmada.blogspot.in/
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कार्यशाला छंद बहर दोउ एक है - ९ रगण यगण गुरु = २१२ १२२ २ सात वार्णिक उष्णिक जातीय, बारह मात्रिक आदित्य जातीय छंद बहर- फाइलुं मुफाईलुं*मुक्तक मेघ ने लुभाया है मोर नाच-गाया है जो सगा नहीं भाया वह गया भुलाया है *मौन मौन होता है शोर शोर बोटा है साफ़-साफ़ बोले जो जार-जार...
 पोस्ट लेवल : कार्यशाला
मुक्तक मुक्तक चोट खाते हैं जवांदिल, बचाते हैं और कोखुद न बदलें, बदलते हैं वे तरीके-तौर को मर्द को कब दर्द होता, सर्द मौसम दिल गरम आजमाते हैं हमेशा हालतों को, दौर को ***नाग नाथ को बिदा किया तो साँप नाथ से भी बचनादंश दिया उसने तो इसने भी सीखा केवल डँसना दलदल दल...
 पोस्ट लेवल : मुक्तक
मुक्तक सलिलासंजीव*नाग नाथ को बिदा किया तो साँप नाथ से भी बचनादंश दिया उसने तो इसने भी सीखा केवल डँसनादलदल दल का दल देता है जनमत को सत्ता पाकर-लोक शक्ति नित रहे जागृत नहीं सजगता को तजना।*परिवर्तन की हवा बह रही इसे दिशा-गति उचित मिलेबने न अंधड़, कुसुम न जिसमें जन-आशा...
 पोस्ट लेवल : मुक्तक सलिला