ब्लॉगसेतु

4 मां-बाबू निश्चिंत ! ब्याह गई लड़की छुट्टी हुई . झटपट गंगा नहा लिये .अम्माँ ने बोला था ,बियाह जाए लरकिनी तो हे ,महेस-भवानी ,सीता राम जी ,राध-किशन जी ,घर में अखंड रामायन का पाठ धरेंगी. वही  बाकी रह गई ,सो भी निबटाये दे रहे हैंसारे काम सुलट गये ,निचिंत हो...
*चार साल बीत गए.उस दिन शृंगार किए बैठी रह गई थी ,आज फिर विवाह-मंडप में उपस्थित है -किसी दूसरे के लिए .वस्त्राभूषण का चढ़ावा सम्हालती भाभी रुचि को लिवा ले गईं.कर्नल साहब फिर सोने नहीं गए .वहीं साइड में पड़े काउच पर बैठ गए .किसी से कुछ बात-चीत नहीं .वैसे भी उनके&nbsp...
*देखा -सामने वही खड़े हैं .प्रथम दर्शन के पल आँखों में कौंध गये .वे ही लोचन जिनकी दृष्टि से लज्जित हो उसने पलकें झुका ली थीं . हलके से आँखें उठाईं ।चार बरस पहले देखी मनभावनी सूरत पहले से अधिक प्रभावशाली और गंभीर.   मन में गहरी टीस उठी .जी धक् से...
* इस बार तो भानमती ने मुझी से  प्रश्न कर दिया -'सुना है न आपने  -साठा सो पाठा ?''हाँ हाँ सुना क्यों नहीं !''कछु समझ में आया ?पहेलियाँ क्यों बुझा रही हो ? और वह शुरू हो गई -दुइ दिन पहले की बात है कल ऊ घर की महरी ,काम करने के बजाय ताव खाती हमारे &...
 लेखक की बात खत्म हुई ,अब बारी प्रबुद्ध पाठक-वर्ग की -* (सह-ब्लागर ,अनामिका जी ) :* 1.'... शायद आज इस उपन्यास पर मेरा टिप्पणी देना कोई मायने नहीं रखता होगा. लेकिन लेखक जब इतनी मेहनत करते हैं तो पाठक का भी फ़र्ज़ बनता है की अपनी प्रतिक्रिया दे, हो सकत...
59.परीक्षित का राज्याभिषेक धूम-धाम से संपन्न हो गया . मणिपुर नरेश और कौरव्य नाग के परिवारों का समर्थन था ही,उलूपी और चित्रांगदा के साथ सभी पांडव-बंधुओं की अन्य पत्नियों के परिवार भी सादर आमंत्रित थे.सबका समुचित सत्कार किया था पांचाली ने .पौत्र को निर्देश दिया था इस...
*गली के मोड़ तक पहुँची ही थी - भानमती दिख गई .' अरी ओ भानमती ,कहाँ चली जा रही हो ?' मैंने आवाज़ लगाई ,' ईद का चाँद हो गईं तुम तो !यों ही निकली जा रही हो  ?'सिर उठा कर देखा उसने  ,पास आ गई ,आप ही के घर आते-आते ,अपने सोच में डूबे आगे निक...
57.सबसे आग्रह था कथा के श्रवण हेतु ऊंच-नीच ,धनी-निर्धन,पंडित-अपढ़ का कोई भेद नहीं. सब समकक्ष हो कर श्रवण करें .उछाह भरे प्रजा- जन उमड़ आये .सम्राट् को अपने पास ,समान आसन पर पा कर अभिभूत हो गये .सबकी सुख-सुविधा हेतु चारों भाई सजग हैं,कोई किसी को बता रहा है -' इस आयो...
55 .*विषम जीवन के दुर्दांत क्षणों में जो निरंतर अवलंब दिये था वह आधार चला गया . अधीर हो-हो कर बार-बार  रो पड़ती है पांचाली .बिखरे केश ,वस्त्र मलीन - धरती पर बैठी है .सारे भान भूल गई है . अनायास आँसू बहने लगते हैं ,पोंछने की सुध नहीं .अंतर की वेदना बार-बार मुखर...
53.'आज कैसा निचिंत तुम्हारे पास बैठा हूँ सखी,बस यही क्षण मेरे अपने होते हैं . जब तुम्हारे साथ होता हूँ ,तुमसे सुन लेता हूँ अपनी कह देता हूँ .और कौन है जिससे कह लूँ ?कल नहीं होऊँगा यहाँ.,..पता नहीं फिर.कब...' यह कैसा स्वर हुआ जा रहा है - क्या हो रहा है आज इन्हे...