ब्लॉगसेतु

*भारत की सात पुराण प्रसिद्ध नगरियों में प्रमुख स्थान रखती उज्जयिनी सभी कल्पों तथा युगों में अस्तित्वमान रहने के कारण अपनी 'प्रतिकल्पा' संज्ञा को चरितार्थ करती है. प्राचीन मान्यता के अनुसार, महाकाल स्वयं प्रलय के देवता हैं, " प्रलयो न बाधते तत्र महाकालपुरी". पुराणों...
बिन मात्रा जग सून .शाम हो रही थी .घर से थोड़ा आगे बढ़ी ही थी कि एक घर के लान में खड़ी आकृति बड़ी परिचित-सी लगी, याद नहीं आ रहा था कहाँ देखा है. बरबस उसकी ओर बढ़ती चली गई. चुपचाप खड़ी थी .'ऐसी चुप-चुप क्या सोच रही हो ? और बिलकुल अकेली! सब लोग कहाँ है?''सब घर मे...
*फ़िल्में और उनके गीत ,हमारे शयन-कक्षों और ड्राइँग रूम्स का हिस्सा बन चुके हैं .मुंबइया हिन्दी  हमारी भाषा में छौंक लगाने लगी  है (बिंदास ,मवाली,काय कू आदि  ). देर-सवेर .स्वीकारना पड़ेंगे हीएक और वर्ग है जो अंदर घुस आनेकी फ़िराक में सड़कों पर पर घूम...
*               भ्रमण के लिये बाहर न जा पाऊँ तो साँझ घिरे ,अपने ही  बैकयार्ड में टहलना अच्छा लगता है . ड्राइव वे तक, मज़े से सवा-सौ  कदम हो जाते है दोनो ओर से ढाई सौ - काफ़ी है कुछ चक्कर लगाने के लिये.धुँधळका छाया ह...
*अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं-  आपकी तारीफ़ ? भला कोई अपने मुँह से अपनी तारीफ़ करता है?अब क्या-क्या कहूँ अपने बारे में, मुझे तो शरम आती है.फिर भी बताना तो पड़ेगा ही  .लेकिन  तारीफ़ नहीं ,असलियत ही कुबूलूँगा.हाँ, मैं हरफ़नमौला आदमी हूँ .बहुत काम कर-...
 कहाँ शक्कर और कहाँ गुड़ ! एक रिफ़ाइंड, सुन्दर, खिलखिलाकर बिखर-बिखर जाती, नवयौवना , देखने में ही संभ्रान्त, सजीली शक्कर और कहाँ गाँठ-गठीला, पुटलिया सा भेली बना गँवार अक्खड़  ठस जैसा गुड़?पर क्या किया जाय पहले उन्हीं बुढ़ऊ को याद करते हैं लोग. इस चिपक...
*कुछ दिन पहले 104 साल के बॉटनी और इकोलॉजी के प्रख्यात वैज्ञानिक डेविड गुडऑल ने ऑस्ट्रेलिया में अपने घर से विदा ली और अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने के लिए दुनिया के दूसरे छोर के लिए रवाना हो गए.उन्हें कोई बड़ी बीमारी नहीं है लेकिन वे अपने जीवन का सम्मानजनक अंत चाहते हैं...
शप्त मानवता के  विषम व्रण माथे पर लिये मैं,अश्वत्थामा ,युगान्तरों से  भटक रहा हूँ .चिर-संगिनी है  वह अहर्निश वेदना जिसकी यंत्रणा से विकल ,मैं वहाँ से भागा था .कितना लंबा विरामहीन जीवन जी आया ,अनगिनती पीढ़ियों को  बनते-बिगड़ते देखा .कितने युगों क...
*हिन्दी भाषा में परम्परा से चले आते कुछ ऐसे शब्द हैं जिनका ,समय के प्रवाह और परिस्थितियों के फेर में , अपने पूर्व अर्थ से बहुत अपकर्ष हो चुका है.सामाजिक परिवर्तनों और सांस्कृतिक अवमूल्यन के कारण शब्द भी अपनी व्यञ्जना शक्ति और प्रभावशीलता खो कर सामान्य और रूढ़ हो जा...
हड्डी चिंचोड़ने की आदत अपने  बस में कहाँ  कुत्तों के .मांस देख ,मुँह से टपकाते लारवहीं मँडराते .सूँघते , आँखों तक उमड़ा बहाआता , मांस का काल्पनिक स्वाद , अकुलाते पंजे रह-रह काँपते ,टूट पड़ते मौका देख . बाप ,भाई, फूफा, मामा ,चाचा ,...