ब्लॉगसेतु

कहाँ मिला ,इंसाफ़,आधा-अधूरा रहा .छूट गया सबसे पातकी गुनहगार,  उढ़ा दी पापियों ने  भेड़िये को भेड़ की खाल, और छुट्टा छोड़ दिया - फिर-फिर घात लगाने के लिए.वीभत्स  पशु,दाँत निपोरता  मौका तक रहा होगा . खोजो ,क...
*दूर-दूर तक जाएँ ,मेरी मंगल कामनाएँ! कोई जाने , न जाने -तरल तरंगों सी प्रतिध्वनि ,सब अपनो में जगाएँ !मौसमी हवाओं सँग मेरे सँदेसे शुभ ऊर्जा जगाते ,आनन्द-उछाह भरें, मन में उजास जगा, दूर करें मलिन छायाएँ!सदिच्छा के सूक्ष्म बीज नेह-गंधमय फसल उग...
बिलकुल नही सो पाती ,यों ही बिलखते ,कितने दिन हो गए ! झपकी आते ही चारों ओर  वही भयावह घिर आता है -नींद के अँधेरे में अटकी मैं,पिशााचों का घेरा  .  बस में खड़ी बेबस  झोंके खाती देह ,  आगे पीछे,इधऱ से उधर से ,उँगलियाँ कोंचत...
*द्वापर बीत गया. मानव के मान-मूल्यों के क्षरण की गाथा रच, मानव चरित्र का वह अद्भुत आख्यान,अपने अध्याय पूरे कर, छोड़ गया अंतर्चेतना के मंथन से प्राप्त नवनीत - गीता का जीवन-बोध!एक बार तब देखा था आदर्शों से व्यावहारिकता का पलायन. सहस्राब्दियों लंबा जीवन जीते-जीते कितन...
*यही है मेरा अपना देश ,विश्व में जिसका नाम विशेष,धार कर विविध रूप रँग वेष, महानायक यह भारत देश. सुदृढ़ स्कंध, सिंह सा ओज, सत्य से दीपित ऊँचा भाल,प्रेम-तप पूरित हृदय-अरण्य, बोधमय वाक्,रुचिर स्वरमाल.वनो में बिखरा जीवन-बोध,उद्भिजों का अनुपम संसार,धरा पर जीवन का व...
*मु्क्त छंद सा जीवन ,अपनी लय  में  लीन , अपने तटों में बहता रहे स्वच्छंद .न दोहा, न चौपाई - बद्ध कुंड हैं जल के.कुंडलिया छप्पय? बिलकुल नहीं -ये हैं फैले ताल ,भरे हुए जहाँ के तहाँ , वैसे के वैसे .मैं ,धारा प्रवाह,छंद - प्रास - मात्रा प्रतिबंध से...
*कैसा परचा थमा दिया  इस परीक्षा कक्ष में ला कर तुमने !प्रश्न ,सारे अनजाने  अजीब अनपहचाने, विकल्प कोई नहीं . नहीं पढ़़ा, यह कुछ पढ़़ा नहीं मैंने,उत्तर कहाँ से लाऊं?*प्रश्नपत्र आगे धरे बैठे रहना है कोरी कापी - कलम समेटे&nb...
*श्रद्धाञ्जलि ?ओह -अंजलि भर फूल सिर झुका कर  गिरा देनामन का गुबार शब्दों में बहा  देना ,गंभीरता ओढ़ माथा झुका देना -  हो जाती है श्रद्धञ्जलि ?नहीं ,तुम्हारे प्रति मन-बचन -कर्म से  ,शब्दों में अर्पितयह ज्ञापन है ,हमारी  अंजलि में ,कि दा...
*नहीं ,आँसू नहीं ,आग है !धधक उठा अंतस् रह-रह उठती लपटें ,कराल क्रोध-जिह्वाएँ रक्तबीज-कुल का नाश,यही है संकल्प .बस !शान्ति नहीं ,चिर-शान्त करना है  सारा भस्मासुरी राग.यह रोग ,रोज़-रोज़ का चढ़ता बुख़ार ,यह विकार ,मिटाना है जड़-मूल से .नहीं मि...
विसर्जन के फूल*फूल उतराते रहे दूर तक, महासागर के अथाह जल में.  समा गये संचित अवशेषकलश से बिखर हवाओं से टकराते,सर्पिल जल-जाल में विलीन हो गए .*अपार सिंधु कीउठती-गिरती लहरों मेंओर- छोरहीन,अनर्गल पलों में परिणत,बिंबित होते  बरस- बरस,जैसे अनायास पलट...