ब्लॉगसेतु

लघुकथा-पितृदिवस पर आप अच्छे हो "निभा, कहाँ है हमारी लाडली बिटिया। देखो!हम तुम्हारे लिए क्या लाये हैं।" घर में घुसते ही नीलेश ने बड़े प्यार से तेज आवाज़ में कहा । सामने विभा खड़ी थी। उसने इशारे से बताया कि निभा अपने कमरे में है। आज दोपहर में निभा का बारहवीं के रिज...
 पोस्ट लेवल : लघुकथा
कल माँ पर लिखा...आज एक माँ लिखेगी ।हम उनके दिलों में रहते हैंइसको वे कहते नहींउनके काम बताते हैंलेखनी थामी जब हाथों मेंवे ब्लॉग बनाकर खड़े रहेममा को तुक की कमी न होशब्दों के व्यूह में पड़े रहेshabdvyuh.comहम उनके दिलों में रहते हैंइसको वे कहते नहींउनके काम बताते हैंज...
 पोस्ट लेवल : कविता दिवस सभी रचनाएँ
अभिनंदन राम काभारत की माटी ढूँढ रहीअपना प्यारा रघुनंदनभारी भरकम बस्तों मेंदुधिया किलकारी खोई होड़ बढ़ी आगे बढ़ने कीलोरी भी थक कर सोईमहक उठे मन का आँगनबिखरा दो केसर चंदनवर्जनाओं की झूठी बेड़ीललनाएँ अब तोड़ रहींअहिल्या होना मंजूर नहींरेख नियति की मोड़ रहींविकल हुई मधुबन की...
धरती को ब्याह रचाने दो------------------------------धरती ब्याह रचाती हैपीले पीले अमलतास सेहल्दी रस्म निभाती हैधानी चुनरी में टांक सितारेगुलमोहर बन जाती हैदेखो, धरती ब्याह रचाती है।आसमान के चाँद सितारेउसके भाई बन्धु हैंलहराते आँचल पर निर्मलबहता जाता सिंधु हैओढ़ चुनरि...
जागो वोटर जागोअपने मत का दान कर, चुनना है सरकार।इसमें कहीं न चूक हो, याद रहे हर बार।।याद रहे हर बार, सही सांसद लाना है।जो करता हो काम, उसे ही जितवाना है।सर्वोपरि है देश, जहाँ पलते हैं सपने।'मधु' उन्नत रख सोच, चुनो तुम नेता अपने।।१जिम्मेदारी आपकी, चुनने की सरकार।सजग...
गुलमोहर खिलता गया, जितना पाया ताप |रे मन! नहीं निराश हो, पाकर के संताप |।१उसने रौंदा था कभी, जिसको चींटी जान।वही सामने है खड़ी, लेकर अपना मान।।२रटते रटते कृष्ण को, राधा हुई उदास।चातक के मन में रही, चन्द्र मिलन की आस।।३रघुनन्दन के जन्म पर, सब पूजें हनुमान।आखिर ऐसा क्...
ऐसा है उपहार कहाँ......नया वर्ष तम सारे हर लेऐसा है उपहार कहाँचले संग जो सदा हमारेवह जीवन का सार कहाँधरती की ज्वाला ठंडी होनदिया में वह धार कहाँबिन डगमग जो पार उतारेवैसी है पतवार कहाँउठे हाथ जो सदा क्षमा कोऐसे रहे विचार कहाँएक बात जो सर्वम्मत होवह सबको स्वीकार कहाँ...
 पोस्ट लेवल : कविता
1.समझौताघर में चाहे जितने भी बदलाव किए जाते मगर बैठक के मुख्य द्वार के एक ओर दो सजी कुर्सियाँ वापस रख दी जाती थीं| एक कुर्सी पर करीने से एक तुलसी माली टँगी रहती | दूसरी कुर्सी पर एक छड़ी, एक चश्मा और एक पेन रहते थे| सजावट के ख्याल से छड़ी पर सुनहरी मूठ लगवा दी गई थ...
 पोस्ट लेवल : लघुकथा
कलकल नदिया है बही, छमछम चली बयार |गिरिराज हैं अटल खड़े, लिए गगन विस्तार ||लिए गगन विस्तार, हरी वसुधा मुस्काई ,दूर्वा पर की ओस, धूप देख कुम्हलाई ||तितली मधु को देख, मटक जाती है हरपल ,छमछम चली बयार, बही है नदिया कलकल ||गरिमा बढ़ती कार्य से, होता है गुणगान |जग में सूर...
जीवन यात्रा अनवरत, चली सांस के साथ |मध्यम या फिर तीव्र गति, स्वप्न उठाती माथ ||स्वप्न उठाती माथ, कभी रोती या हँसती |करती जाती यत्न, राह से कभी न हटती|पढ़ कर हर पग पाठ,'ऋता'' बनती है छात्रा|चुक जाएगी सा़ंस, रुकेगी जीवन यात्रा||जिनके हिय में हरि बसे, वे हैं साधु समान...