ब्लॉगसेतु

     पढ़ाई पूरी करने के बाद जब रोजी रोटी की बात आती है तो हमारे पास तीन विकल्प होते हैं|1बहुराष्ट्रीय कम्पनी/प्राइवेट की नौकरी2.सरकारी नौकरी3.स्वरोजगारफेसबुक पर मैंने एक वोटिंग कराई| वोटिंग सिर्फ एक दिन के लिए थी और सिर्फ मित्रसूची में शामिल मित्रों...
 पोस्ट लेवल : आलेख
राह....राह अनगिन हैं जग मेंराह का ले लो संज्ञानकहीं राह सीधी सरलकहीं वक्र बन जातीकहीं पर्वत कहीं खाईकभी नदिया में समातीसभी पार कर लोगे बंधुत्याग चलो अभिमानकहीं मिलेंगे सुमन राह मेंकहीं कंटक वन पाओगेकहीं है मुनियों का बसेराकहीं चंबल से घबराओगेधैर्य जरा रख लेना बंधुख...
न्यु इयरमाँ के स्वर्गवास के बाद अवनि को मैके जाने का मन नहीं होता था| फोन पर भाई भाभी हमेशा उसे बुलाते किन्तु वह उदासीन भाव से मना कर देती| उसे लगता कि अब सभी भाई बहनों का अपना अपना परिवार है तो वह किसी को डिस्टर्ब करने क्यों जाए| उस दिन भी फोन पर भाई से बातें हो र...
 पोस्ट लेवल : लघुकथा
धूप एक नन्हीं सीधुंध को ठेल करहवा से खेलकरधूप एक नन्हीं सीधरती पर आईबगिया के फूलों पर ओज फैलाती हैफुनगी पर बैठकरबच्चों को बुलाती हैसन्नाटों के भीड़ मेंउनको न देखकरकूद फांद भागकरकी है ढूँढाईधूप एक नन्हीं सीधरती पर आईस्कूल की कोठरी मेंपोथियों का ढेर हैअनगिन है सी एफ ए...
नौका समय की जब बनी वो, अनवरत बहने लगी |मासूम बचपन की कहानी, प्यार से कहने लगी ||कोमल घरौंदे रेत के वो, टूटकर बिखरे रहे |हम तो वहीं पर आस बनकर, पुष्प में निखरे रहे ||1||तरुणी परी बन खिलखिलाई, चूड़ियों में आ बसी |अनुराग की वो प्रीत बनकर, रागिनी में जा बसी ||वो बंसरी...
 पोस्ट लेवल : छंद हरिगीतिका
निग़ाहों की बातें छुपाने से पहलेनज़र को झुकाए थे आने से पहलेनदी के किनारे जो नौका लगी थीबहुत डगमगाई बिठाने से पहलेजो आज़ाद रहने के आदी हुए थेबहुत फड़फड़ाए निभाने से पहलेकरामात होती नहीं ज़िन्दगी मेंपकड़ना समय बीत जाने से पहलेबहन की दुआ आँक पाते न भाईकलाई पे राखी सज...
 पोस्ट लेवल : ग़ज़ल
इन्तिज़ारसर्वशक्तिमान को है बंदगी का इन्तिज़ारजिंदगी में हर किसी को है किसी का इन्तिज़ारलाद कर किताब पीठ पर थके हैं नौनिहाल'वो प्रथम आए', विकल है अंजनी का इन्तिज़ारपढ़ लिए हैं लिख लिए हैं ज्ञान भी वे पा लिए हैंअब उन्हें है व्यग्रता से नौकरी का इन्तिज़ारबूँद स्वाति...
 पोस्ट लेवल : ग़ज़ल
ग़ज़लबेबसी की ज़िन्दगी से ज्ञान लेती मुफ़लिसीमुश्किलों से जीतने की ठान लेती मुफ़लिसीआसमाँ के धुंध में अनजान सारे पथ हुएरास्तों को ग़र्द से पहचान लेती मुफ़लिसीबारिशों में भीगते वो सर्दियों में काँपतेमाहताबी उल्फ़तों का दान लेती मुफ़लिसीभूख की ज्वाला बढ़ी तब पेट पकड़...
 पोस्ट लेवल : ग़ज़ल
नभ अब्र से भरा हो निहाँ चाँदनी रहेतब जुगनुओं से ही यहाँ शबगर्दगी रहेमन में जले जो दीप अक़ीदत का दोस्तोउनके घरों में फिर न कभी तीरगी रहेकटते रहे शजर और बनते रहे मकाँ हर ही तरफ धुआँ है कहाँ आदमी रहेआकाश में बची हुई बूँदें धनक बनींहमदर्द जो हों लफ़्ज़ तो यह ज़िन्दगी र...
 पोस्ट लेवल : ग़ज़ल
बचपन के जैसा फिर यहाँ मंजर नहीं देखागोदी हो जैसे माँ की, वो बिस्तर नहीं देखाहिन्दू या मुसलमान में आदम यहाँ उलझेहों सिर्फ़ जो इंसान वो लश्कर नहीं देखाधरती पे लकीरें हैं दिलों में हैं दरारेंकाटे जो समंदर वही नश्तर नहीं देखाबिखरे जो कभी गुल तो, रहे साथ में ख़ुशबूजो तो...
 पोस्ट लेवल : ग़ज़ल