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  कृष्णमोहन झा के कविता का संसार पृथ्वी और आकाश से लेकर चिटियों तक फैला हुआ है – कवि की स्मृतियाँ कई बार चकित करती हैं और चकित करता है उन स्मृतियों को कविता में अपनी पूरी कला से साथ उकेर देना। इस दुनिया में लगातार पसर रही कुरूपता को लेकर कवि हताश तो होता है ले...
सलीका चाहिए आवारगी में  (सन्दर्भ ‘आवारा मसीहा’) वंदना चौबे             “बहुत मुश्किल है बंजारा मिज़ाजी     सलीका  चाहिए   आवारगी  में”           ...
  विनय कुमार की कविताएँ सहज-सरल होती हुई भी सतर्कता और ध्यान रखकर पढ़ने की मांग करती हैं। वे जिस विषय पर कविता लिख रहे होते हैं उसके बाह्य के साथ अभ्यंतर तक जाते हैं इसलिए उनके यहाँ निर्जीव लगती चीजें भी सजीव होकर बोलने-बतियाने लगती हैं। कवि अपने मानस की सजगता...
फड़फड़ाती जुगुप्सा, निराशा और भय के बीच कहानीः उपन्यास 'हरामी'यतीश कुमार कुछ किताबें शुरुआती पन्नों से ही पाठकों को अपनी गिरफ्त में लेना शुरू कर देती हैं। अपने अलग मिज़ाज़ और कथ्य को लेकर लिखे उपन्यास 'हरामी' को पढ़ना शुरू करते ही कुछ सवाल मन में उपजते हैं और उनका जवाब...
बेचूलाल का भूत उर्फ बेलाकाभू पंकज मित्र   पंकज मित्रजब से ‘क़यामत से क़यामत तक’ को ‘क्यू एस क्यू टी’ और ‘दिलवाले दुल्हनिया लेजाएँगे’ को डी डी एल जे कहने का प्रचलन हुआ तकरीबन उसी वक्त यह तय हो गया था कि‘बेचूलाल का भूत’ को ‘बे ला का भू’ कहा जाएगा, हालाँकि इसकी और...
हिन्दी का साहित्यिक इतिहास कैसे लिखें? डॉ. अजय तिवारी     डॉ. अजय तिवारीसाहित्य के इतिहास-लेखन को लेकर लंबे समय से चिंता व्यक्त की जाती रही है। पिछले दिनों भारतीय भाषा परिषद ने इस विषय पर लंदन, श्रीलंका, मॉरीशस और भारत समेत कई देशों के हिन्दी सेवियों के स...
    सन्तति, अवतरण और लीलाएँमदन पाल सिंह   बाबा अलाव के पास खाँसता था। साथ ही सूखे-झुर्रीदार घुटनों पर ठुड्डी टिकाये, दुविधा और ख़ुशी के भँवर में डूबता-उतरता, आग कुरेदने लगता...  एक बाप के लिए सौभाग्य का उत्सव उसके पुत्र के विवाह का अवसर हो...
            समाज की दशा और दिशा – पाँचवी दिशा    सुषमा मुनीन्द्र   सुषमा मुनीन्द्रकविता, कहानी, अनुवाद, कथेतर गद्य जैसी रचनाधर्मिता से अपने रचना संसार को समृद्ध करने वाले रचनाकार सुशांत सुप्रिय के 160 पृष्ठों में व...
सौमित्रसौमित्र की कविताएँ घर आँगन से होती हुई प्रकृति के विशाल फलक तक तो जाती ही हैं वे उम्मीद और प्रेम सहेजे रखना भी जानती हैं। स्नोतकोत्तर की पढ़ाई के बाद सौमित्र प्राय़ः देश से बाहर ही रहे लेकिन उनकी कविताओं में भारतीय संस्कृति और परम्परा की गहरी अनुगूँज देखने को...
आरम्भ का कवि और अन्त का द्रष्टा पंकज कुमार बोस कुँवर नारायणकुँवर नारायण हमेशा एक मनुष्य और कवि के रूप में सार्थकता की तलाश करते रहे, लेकिन जीवन से कभी कोई विशेष उम्मीद लगा कर नहीं बैठे। संभवतः इसी निराकांक्षी भाव के फल रूप में उन्हें जीवन से भरपूर और अप्रत्याशित मि...