ब्लॉगसेतु

हमारी कथनी और करनी में कितना अंतर है इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमारी हिंदी के प्रति सोच और व्यवहार है. सार्वजनिक मंच पर हिंदी को प्रशासन और जनसाधारण की एक मात्र भाषा बनाने की प्रतिज्ञा लेकर जब हम अपने घर या कार्यस्थल पर पहुंचते हैं तो हमारी सोच और व्यवहार बिलकुल बदल जात...
क्या मैं सदैव सत्य बोलता हूँ? बोल पाता हूँ? क्यूँ ? एक ऐसा प्रश्न जिसका उत्तर आसान भी है और बहुत कठिन भी. बहुत आसान है यह कहना कि जिसे मेरा मन या अंतरात्मा सच मानता है उसे मैं बिना किसी भय या परिणाम की चिंता किये स्पष्ट कह देता हूँ, क्यूँ कि ऐसा करने से मेरे मन को...
अप्रैल माह रविवार की एक भीगी भीगी सी सुबह थी. खिड़की से बाहर झांकती सुमन बोली ‘रमेश, बाहर देखो कितना सुहावना मौसम है. रात भर ओले और तेज बारिस के बाद बाहर कितना अच्छा मौसम हो गया है. बहुत दिन हो गए गर्मी में घर में बैठे बैठे. चलिए कहीं पिकनिक पर चलते हैं बच्चों के सा...
जब दामिनी के साथ घटे वीभत्स कृत्य पर सारा देश आक्रोश से उबला तो एक आशा जगी थी कि देश में स्त्रियों के प्रति हो रहे अपराधों के प्रति व्यवस्था और जनता जागरूक होगी और इन अपराधों में कमी आयेगी. लेकिन क़ानून में बदलाव और सुधार के बाद भी आज भी प्रतिदिन इन घटनाओं में कोई क...
कविता वर्मा जी के कहानी लेखन से पहले से ही परिचय है और उनकी लिखी कहानियां सदैव प्रभावित करती रही हैं. उनका पहला कहानी संग्रह “परछाइयों के उजाले” हाथ में आने पर बहुत खुशी हुई. पुस्तक को एक बार पढ़ना शुरू किया तो प्रत्येक कहानी अपने साथ भावों की सरिता में बह...
श्री विजय कुमार जी का कहानी संग्रह ‘एक थी माया’ हाथ में आते ही उसके आवरण ने मंत्र मुग्ध कर एक माया लोक में पहुंचा दिया. जब मैं पुस्तक के पृष्ठ पलट ही रहा था कि मेरी धर्म पत्नी जी मेरे हाथ से पुस्तक लेकर देखने लगीं और बोलीं कि विजय जी की नयी पुस्तक है. मुझे विश्वास...
समाचार पत्रों में सुबह सुबह हमारे किशोरों की गंभीर अपराधों में शामिल होने की खबरें जब अक्सर देखता हूँ तो पढ़ कर मन क्षुब्ध हो जाता है. कुछ दिन पहले समाचार पत्रों में खबर थी कि चार किशोरों ने कक्षा से १२ साल के लडके को बाहर खींच कर निकाला और चाकुओं से उसे घायल कर दि...
एक समय था जब बुज़ुर्गों की तुलना घर की छत से की जाती थी जिसके आश्रय में परिवार के सभी सदस्य एक सुरक्षा की भावना महसूस करते थे, लेकिन आज वही छत अपने आप के लिये सुरक्षा की तलाश में भटक रही है. टूटते हुए संयुक्त परिवार, निज स्वार्थ की बढती हुई भावना, शहरों में परिवार...
     भ्रष्टाचार केवल वर्तमान समय की देन नहीं है. यह हरेक युग में किसी न किसी रूप में विद्यमान रहा है, यद्यपि इसका रूप, मात्रा और तरीके समय समय पर बदलते रहे हैं. कौटिल्य ने अपने ग्रन्थ ‘अर्थशास्त्र’ में राज कर्मचारियों द्वारा  सार्वजनिक धन के दुर...
     २०-२५ साल पहले की घटना है. अपने कार्यालय के कार्य से मुझे गुड़गाँव जाना था. उस समय का गुड़गाँव आज की तरह विकसित नहीं, बल्कि एक छोटा सा शहर था. मैं शिवाजी स्टेड़ियम (दिल्ली) से बस पकड़ कर गुड़गाँव गया और उसी दिन कार्य समाप्त करके शाम को ४ बजे के...