ब्लॉगसेतु

कितनी दूर चला आया हूँ,कितनी दूर अभी है जाना।राह है लंबी या ये जीवन,नहीं अभी तक मैंने जाना।नहीं किसी ने राह सुझाई,भ्रमित किया अपने लोगों ने।अपनी राह न मैं चुन पाया,बहुत दूर जाने पर जाना।बढ़े हाथ उनको ठुकराया,अपनों की खुशियों की खातिर।लेकिन आज सोचता हूँ मैं,अपने दिल क...
चारों ओर पसरा है सन्नाटामौन है श्वासों का शोर भी,उघाड़ कर चाहता फेंक देनाचीख कर चादर मौन की,लेकिन अंतस का सूनापनखींच कर फिर से ओढ़ लेता चादर सन्नाटे की।पास आने से झिझकतासागर की लहरों का शोर,मौन होकर गुज़र जाता दरवाज़े से दबे क़दमों से भीड़ का कोलाहल, अनकहे...
बन न पाया पुल शब्दों का,भ्रमित नौका अहसासों कीमौन के समंदर में,खड़े है आज भी अज़नबी से अपने अपने किनारे पर।****अनछुआ स्पर्शअनुत्तरित प्रश्नअनकहे शब्दअनसुना मौन क्यों घेरे रहतेअहसासों को और माँगते एक जवाब हर पल तन्हाई में।****रात भर सिलते रहे दर्द की चादर,उधेड़ गया फिर...
तुम संबल हो, तुम आशा हो,तुम जीवन की परिभाषा हो।शब्दों का कुछ अर्थ न होता,उन से जुड़ के तुम भाषा हो।जब भी गहन अँधेरा छाता,जुगनू बन देती आशा हो।जीवन मंजूषा की कुंजी,करती तुम दूर निराशा हो।नाम न हो चाहे रिश्ते का,मेरी जीवन अभिलाषा हो।...©कैलाश शर्मा
कुछ घटता है, कुछ बढ़ता है,जीवन ऐसे ही चलता है।इक जैसा ज़ब रहता हर दिन,नीरस कितना सब रहता है।मन के अंदर है जब झांका,तेरा ही चहरा दिखता है।चलते चलते बहुत थका हूँ,कांटों का ज़ंगल दिखता है।आंसू से न प्यास बुझे है,आगे भी मरुधर दिखता है।...©कैलाश शर्मा
गीला कर गयाआँगन फिर से,सह न पायाबोझ अश्क़ों का,बरस गया।****बहुत भारी हैबोझ अनकहे शब्दों का,ख्वाहिशों की लाश की तरह।****एक लफ्ज़जो खो गया था,मिला आजतेरे जाने के बाद।****रोज जाता हूँ उस मोड़ पर जहां हम बिछुड़े थे कभी अपने अपने मौन के साथ,लेकिन रोज टूट जाता स्वप्नथामने से...
यादों में जब भी हैं आती बेटियां,आँखों को नम हैं कर जाती बेटियां।आती हैं स्वप्न में बन के ज़िंदगी,दिन होते ही हैं गुम जाती बेटियां।कहते हैं क्यूँ अमानत हैं और की,दिल से सुदूर हैं कब जाती बेटियां।सोचा न था कि होंगे इतने फासले,हो जाएंगी कब अनजानी बेटियां।होंगी कुछ तो म...
बहुत आसान है फेंकना एक कंकड़ शब्द का और कर देना पैदालहरें अशांति कीअंतस के शांत जल में।बिखरी हुई अशांत लहरेंयद्यपि हो जातीं शांत समय के साथ,लेकिन कितना कठिन हैलगाना अनुमान गहराई काजहाँ देकर गया चोटवह फेंका हुआ कंकड़ झील में।...©कैलाश शर्मा
कुछ दर्द अभी तो सहने हैं,कुछ अश्क़ अभी तो बहने हैं।मत हार अभी मांगो खुद से,मरुधर में बोने सपने हैं।बहने दो नयनों से यमुना,यादों को ताज़ा रखने हैं।नींद दूर है इन आंखों से,कैसे सपने अब सजने हैं।बहुत बचा कहने को तुम से,गर सुन पाओ, वह कहने हैं।कुछ नहीं शिकायत तुमने की,यह...
जब भी पीछे मुड़कर देखाकम हो गयी गति कदमों की,जितना गंवाया समयबार बार पीछे देखने मेंमंज़िल हो गयी उतनी ही दूर व्यर्थ की आशा में।****बदल जाते हैं शब्दों के अर्थव्यक्ति, समय, परिस्थिति अनुसार,लेकिन मौन का होता सिर्फ एक अर्थअगर समझ पाओ तो।****झुलसते अल्फाज़,कसमसाते अ...