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मुझे तो इस फिल्म का नाम भी चार पांच दिन पहले ही पता चला ....लखनऊ टाइम्स में दीपिका, रणवीर को लखनऊ के शीरोज़ में देखा ...शीरोज़ को चलाने वालीं एसिड-अटैक पीड़ित युवतियों के साथ...उस दिन ही पता चला कि छपाक नाम से कोई मूवी रिलीज़ होने वाली है ... दीपिका ने उसमें काम कि...
भारतीय रेल केवल अपने रोलिंग-स्टॉक (रेल इंजन और गाड़ियों के डिब्बे जो रेल पटड़ी पर सरपट भागते हैं) की अच्छी सेहत की ही चिंता नहीं करती ...इसे रेल परिवार के 14 लाख सदस्यों की सेहत की भी पूरी चिंता रहती है ... क्योंकि यही वे लोग हैं जिन के भरोसे हम सब लोग कंबल ओढ़ कर...
आज 14 नवंबर को विश्व मधुमेह दिवस के अवसर पर उत्तर रेलवे मंडल चिकित्सालय लखनऊ में समस्त स्टॉफ एवं मरीज़ों के लिए इस रोग से संबंधित जागरूकता बढ़ाने के लिए एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिस की अध्यक्षता मुख्य चिकित्सा अधीक्षिका डा विश्वमोहिनी सिन्हा ने की और डा अमरेन...
अभी निठल्ले बैठ कर रेडियो सुनते हुए मन में ख़्याल आया कि हम लोग सब कुछ किताबों से और स्कूल से ही नहीं सीखते, बहुत कुछ हमें हमारे पेरेन्ट्स बिना कुछ कहे सिखा के चले जाते हैं...जैसा हम उन का बर्ताव दूसरे लोगों के साथ देखते हैं, हम भी कहीं न कहीं उसी सांचे में ढलने लग...
कुछ दिन पहले हम लोग झांसी की रानी लक्ष्मी बाई पर बनी एक फ़िल्म देखने का प्रोग्राम बना रहे थे ..उसी दौरान वाट्सएप पर एक वीडियो दिख गई जिस में उस फिल्म में लक्ष्मी बाई का किरदार अदा करने वाली नायिका एक नकली घोड़े पर सवारी करते हुए दिखी ...अजीब तो लगा ही ... लेकिन उस...
दिन १७ फरवरी, २०१८ (इतवार)१७ फरवरी इतवार के दिन हम लोग गु़ड़गांव में थे ...यह सूरज कुंड मेले का आखिरी दिन भी था...यह बहुत बड़ा मेला है उस एरिये का ...पिछले ३० बरसों से तमन्ना थी कि सूरज कुंड मेला देखने जाना है ...उस दिन भी हमें गुड़गांव से निकलते निकलते दोपहर के एक...
अभी मैं आज का अख़बार देख रहा था जिसमें लिखा है कि कल लखनऊ एयरपोर्ट से कुछ लोगों की गिरफ्तारी हुई जो सवा करोड़ रूपये की कीमत का सोना बाहर से लेकर आ रहे थे ...उस ख़बर को पढ़ते हुए हंसी भी आ रही थी कि जितनी साईंस इस छोटे से लेख से कोई सीख सकता है, उतनी तो शायद कुछ मास...
उस दिन भी सुबह पार्क में टहलते हुए मज़ा आ गया...उस पार्क में ओपन-एयर जिम वाले उपकरण नये नये लगे थे ...बहुत अच्छा लगा..यह मंज़र अच्छा इसलिए भी लगा क्योंकि वहां उस समय बड़े-बुज़ुर्ग पूरे मज़े कर रहे थे...६०-७० साल की महिलाएं...७०-८० बरस वाले पुरूष ..सब उन नईं मशीनों...
मैं अच्छे से जानता हूं कि सुबह का वक़्त अपने लिए ही होता है ... खु़द के साथ रहने के लिए, क़ुदरत के साथ रहने के लिए...रोज़ाना टहलने के लिए भी ...लेकिन पिछले कुछ हफ़्तों से मेरा टहलना छूटा हुआ था ...कुछ नहीं, बस बहानेबाजी, आज देर से उठा हूं तो टाइम नहीं है, आज जल्दी...
२००७ से यह ब्लॉग लिखना शुरू किया था...वे दिन भी क्या दिन थे..लगभग रोज़ाना कुछ न कुछ इस ब्लॉग पर छाप दिया करता था...फिर पता नहीं यह क्या फेसबुक और बाद में यह व्हाट्सएप पर कुछ कुछ लिखते-पढ़ते रहने से शायद फुर्सत ही नहीं मिलती थी...शायद ग्यारह-बारह सौ पोस्ट हैं इस ब्ल...