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सतीश गुजराल : साभारएक और हिन्‍दी दिवस बीत गया। इस मौके पर राजभाषा के पद पर आसीन हिन्‍दी पर एक और तरह से भी नजर डाली जाए। यह लेख बहुत पहले लिखा था। समय बदला है पर ये बातें अभी भी प्रांसगिक हैं। पढ़कर देखिए।  हिन्दी का राजयोग 1949 से शुरू हुआ। उस साल 14 सित...
 पोस्ट लेवल : विमर्श लेख हिंदी
हम सबके प्‍यारे सुरेंद्र राजन ने यह चित्र फेसबुक पर साझा किया। उस पर मेरी तात्‍कालिक प्रतिक्रियाललाट पर लपट धारे यह कौन है साधु का बाना है देह नहीं चेहरा कहीं को है दृष्टि कहीं और लगता स्थिर है पर चलाएमान है कल कहीं बैठा...
तिब्‍बती कवि लासंग शेरिंग  से कुछ साल पहले धर्मशाला मैक्‍लोडगंज में भेंट हुई थी। तिब्‍बत की आजादी के लिए संघर्ष करने वाला कवि मैक्‍लोडगंज में बुुक वर्म नाम की किताबों की दुकान चला कर अपना जीवन चलाता है और अपने मुल्‍क की आजादी के ख्‍वाब देखता है। लासंग की...
तिब्‍बती कवि लासंग शेरिंग  से कुछ साल पहले धर्मशाला मैक्‍लोडगंज में भेंट हुई थी। तिब्‍बत की आजादी के लिए संघर्ष करने वाला कवि मैक्‍लोडगंज में बुुक वर्म नाम की किताबों की दुकान चला कर अपना जीवन चलाता है और अपने मुल्‍क की आजादी के ख्‍वाब देखता है। लासंग की...
तिब्‍बती कवि लासंग शेरिंग से कुछ साल पहले धर्मशाला मैैक्‍लोडगंज में भेंट हुई थी। तिब्‍बत की आजादी के लिए संघर्ष करने वाला कवि मैक्‍लोडगंज में बुुक वर्म नाम की किताबों की दुकान चला कर अपना जीवन चलाता हैै और अपने मुल्‍क की आजादी के ख्‍वाब देखता है। लासंग की...
तिब्‍बती कवि लासंग शेरिंग से कुछ साल पहले धर्मशाला मैैक्‍लोडगंज में भेंट हुई थी। तिब्‍बत की आजादी के लिए संघर्ष करने वाला कवि मैक्‍लोडगंज में बुुक वर्म नाम की किताबों की दुकान चला कर अपना जीवन चलाता हैै और अपने मुल्‍क की आजादी के ख्‍वाब देखता है। लासंग की चार कविता...
दिव्‍य हिमाचल से बातचीतहिमाचल प्रदेश के एक दैनिक दिव्‍य हिमाचल ने लिखने पढ़़ने वालों के साथ बातचीत की एक श्रृंखला शुरू की है। इसमें मेरी बातचीत 18 अगस्‍त 2018 को प्रकाशित हुई थी जो यहां दी जा रही है। दिव्‍य हिमाचल : अपने भीतर के विद्रोह का संवाद अगर कविता है,...
विष्‍णु खरे : अधूरी रह गई एक बातचीत, रमेश राजहंस के घर विष्‍णु खरे : जब मैं उन्‍हें विजय कुमार जी के घर ले गया विष्‍णु खरे : विजय कुमार जी के साथ हमारे घर परविष्‍णु खरे : काल और अवधि के दरमियान की प्रति विष्‍णु खरे: पाठान्‍तर की प्रतिलिखते कुछ बन नही...
चौबारे पर एकालाप, दूसरा कविता संग्रह इस साल यानी 2018 में छप गया, ज्ञानपीठ प्रकाशन से। पहला संग्रह जगत में मेला आधार प्रकाशन से सन 2002 मेंछपा था। उसमें 2002 से पहले करीब बीस साल की चुनी हुई कविताएं थींं। इसमें 2002 और उसके बाद करीब 15 साल की कविताएं हैं। इस संग्रह...
 पोस्ट लेवल : विजय कुमार कविता
लगे रहो मुन्‍ना भाई फिल्‍म 2006 में आई थी। उसके बाद गांधीवाद को गांधीगिरी नाम मिला और उछाल में भी रहा। यह भी लगा कि सामाजिक आंदोलनों की शुरुआत फिल्‍मों से भी हो सकती है। लेकिन जल्‍दी ही इस अवधारणा की हवा निकल गई। 12 साल बाद इस समीक्षा पर नजर डाली जाए...