ब्लॉगसेतु

चिंतनदिशा में समकालीन कविता पर विजय बहादुर सिंह और विजय कुमार की चिट्ठियां आप पढ़ चुके हैं. फिर अगले अंक में उन चिट्ठियों पर विजेंद्र और जीवन सिंह की प्रतिक्रिया भी पढ़ चुके हैं. चिंतनदिशा के ताजा अंक में राधेश्‍याम उपाध्‍याय, महेश पुनेठा, सुलतान अहमद और मेरी प...
जब से खबर मिली है, भगवत रावत नहीं रहे, उनकी छवि रह रह के आंखों के सामने तैर जाती है. जिंदादिल, आत्‍मीय और मुस्‍कुराता चेहरा. शायद 1991 की बात है, राजेश जोशी ने शरद बिल्‍लोरे पुरस्‍कार समारोह के सिलसिले में भोपाल बुलाया. उन दिनों मैं और सुमनिका दोनों ही आकाशवाणी...
जगदीश्‍वर चतुर्वेदी इधर अपने ब्‍लाग में समसामयिक विषयों पर नियमित टिप्‍पणियां कर रहे हैं. सत्‍यमेव जयते पर उनकी टिप्‍पणी आप भी पढि़ए. सत्यमेव जयते सीरियल की इन दिनों खूब चर्चा है। सामाजिक समस्याओं पर समाज का ध्यान खींचने वाले इस सीरियल को लोग विभिन्न चैनलों पर...
 पोस्ट लेवल : विमर्श सामयिक
मैं बचपन में गांव में था तो स्कूल की कोई याद नहीं है, कब लगता था कब छूटता था। बस आना जाना भर याद है। रास्ते में एक खड्ड पड़ती थी। जंगल था। झाड़ियां थीं। उनमें फल होते थे। जंगली बेर होते थे। यही सब याद है। घर में ट्रक के टायर से निकाले हुए रबड़ के सख्त चक्के को 'गड्...
 पोस्ट लेवल : टिप्पणी अंतर्नाद
शायद दो साल पहले की बात है. सुबह तैयार हो कर दफ्तर के लिए निकला तो हवा खुशगबार थी. यूं वक्‍त का दबाव हमेशा बना रहता है लेकिन उस दिन हवा में कुछ अलग तरह की तरंग थी. जैसे सुबह और शाम के संधिकाल का स्‍वभाव दिन और रात के स्‍वभाव से अलग होता है, वैसा ही शायद मौसमों के ब...
 पोस्ट लेवल : हिमाचल मित्र लोक
इस बार सर्दी का मौसम बड़ा लंबा चल रहा है. कहते हैं कि लोहड़ी वाले दिन सर्दी लंबी छलांग लगाती है. लेकिन यहां तो होली भी एक तरह से सर्दियों मे ही आई. शिमला में बर्फ गिरी, मुंबई सर्द गर्म चल रही है. पिछले दिनों ठियोग से मोहन साहिल ने बर्फ के ये फोटो भेजे. भेखल्‍टी गां...
समकालीन कविता पर चल रही बहस में आप विजय बहादुर सिंह और विजय कुमार के पत्र पढ़ चुके हैं और इन पत्रों पर विजेंद्र की प्रतिक्रिया भी. अब पढि़ए जीवन सिंह की प्रतिक्रिया.       'चिंतन दिशा' का तीसरा अंक तीन महीने पहले मिला था। अब चौथा मिला है। अच्छा...
    आप डॉ. विजय बहादुर सिंह और विजय कुमार के बीच समकालीन कविता पर हुए पत्राचार को पढ़ चुके हैं जो मूलतः चिंतनदिशा में छपा था. अब नए अंक में कवि संपादक विजेंद्र और जीवन सिंह की प्रतिक्रियाएं छपी हैं। पहले पढि़ए विजेंद्र की प्रतिक्रिया। पोस्‍ट लंबी है,...
हाल में पर्वत राग का लीलाधर जगूड़ी अंक छपा है. उसमें जगूड़ी जी ने अपने और अपनी कविताई के बारे में लिखा है. आप भी पढि़ए. मेरा जन्म 1 जुलाई, 1940 के सोमवार को साढ़े नौ बजे सुबह हुआ। मुझे कैसा लगा, नहीं मालूम, पर अपने आज के अनुभव से जानता हूं कि मां और पिता जी को बहुत...
जैसा कि आप जानते हैं मुंबई के कुछ मित्रों ने चिंतनदिशा का प्रकाशन फिर से शुरू किया है. इसके पिछले अंक में विजय बहादुर सिंह और विजय कुमार के बीच कविता की चिंताओं को लेकर हुआ पत्राचार छपा है. पिछली पोस्‍ट में आपने विजय बहादुर का पत्र पढ़ा.अब पेश है विजय कुमार का पत्र...