ब्लॉगसेतु

जैसा कि आप जानते हैं मुंबई के कुछ मित्रों ने चिंतनदिशा का प्रकाशन फिर से शुरू किया है. इसके पिछले अंक में विजय बहादुर सिंह और विजय कुमार के बीच कविता की चिंताओं को लेकर हुआ पत्राचार छपा है. पिछली पोस्‍ट में आपने विजय बहादुर का पत्र पढ़ा.अब पेश है विजय कुमार का पत्र...
मुंबई के कुछ मित्रों ने चिंतनदिशा का प्रकाशन फिर से शुरू किया है. पिछले अंक में विजय बहादुर सिंह और विजय कुमार के बीच कविता की चिंताओं को लेकर हुआ पत्राचार छपा है. पहले पढि़ए विजय बहादुर जी का पत्र.प्रिय विजय कुमारजी,सप्रेम नमस्कार,आज सुबह-सुबह कॉलोनी में श्रीहरि भ...
क से लिखता हूं कव्वा कर्कशक से कपोत छूट जाता है पंख फड़फड़ाता हुआलिखना चाहता हूं कलाकल बनकर उत्पादन करने लगती हैलिखता हूं कर्मठ पढ़ा जाता है कायरडर जाता हूं लिखूंगा कायदाअवतार लेगा उसमें से कातिलकैसा है यह काल कैसी काल की रचना-विरचनाऔर कैसा मेरा काल का बोधबटी हुई र...
 पोस्ट लेवल : कविता
10 दिसंबर को यहां मुंबई के एक उपनगर कल्‍याण में एक कालेज में हिंदी ब्‍लॉगिंग पर एक सेमिनार में भाग लेने का मौका मिला। इसमें कई ब्‍लॉर आए थे। अकादमिक जगत के लागों के बीच यह चर्चा इस दृष्टि से अच्‍छी थी कि अगर हिंदी विभाग ब्‍लागिंग में रुचि लेने लग जाएं तो हिंदी ब्‍ल...
 पोस्ट लेवल : टिप्पणी हिंदी
  पिछले दिनों मुंबई में जहांगीर कला दीर्घा में संजय कुमार की चित्र एवं मूर्ति-शिल्प प्रदर्शनी लगी थी। संजय मूलतः इलाहाबाद के हैं और पिछले कई वर्षों से मंबई में रह कर स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं।  'टाइम्स ट्रांसमिशन' शीर्षक की इस प्रदर्शनी में...
 पोस्ट लेवल : कला
कुछ समय पहले अमृतसर में पंजाब नाटशाला देखने का मौका मिला.  उत्‍तर भारत में शिमला में गेयटी थियेटर और चंडीगढ़ में टेगोर थियेटर के अलावा और कोई नाम ध्‍यान में नहीं आता है. अमृतसर की पंजाब नाटशाला  अपनी तरह का नवीन नाट्यगृह है. खासियत यह है कि यह ए...
छायांकन - हरबीर                                         &nbs...
पिछले कुछ समय से आप यहां डायरी के अंश पढ़ रहे हैं. लगभग एक दशक पुरानी डायरी. यह इस श्रृंखला की अंतिम कड़ी है. सागर तट पर शाम को पर्यटक होते हैं। सुबह सवेरे स्वास्‍थ्‍य के प्रति जागरूक लोग होते हैं। उनमें भी ज्‍यादातर खाए पीए अघाए लोग। सुबह उठते समय जिन्हे...
 पोस्ट लेवल : डायरी
पिछले कुछ अर्से से डायरी के कुछ अंश लगा रहा हूं. ये दस साल से ज्‍यादा पुराने हैं. हमारा वक्‍त बहुत तेजी से बदल रहा है, यह सच है पर बहुत कुछ वैसा ही है, यह भी तो उतना ही सच है. फल वाले के पास एक व्यक्ति आया। सेब के दाम पूछे। संतरे के पूछे। ज्‍यादा भाव-ताव...
 पोस्ट लेवल : डायरी