ब्लॉगसेतु

पिछले दिनों हमारे एक चचेरे भाई का फोन आया कि वे मुंबई पहुंच गए हैं, कई दिन के सफर के कारण बच्‍चे बडे़ सभी बीमार पड़ गए हैं और रात को ही लौट भी जाना है, इसलिए घर नहीं आ पाएंगे। चाची जी के लिए कुछ सामान लाए थे, यहीं छोड़ रहे हैं, तुम आ कर ले जाना। सुबह का वक्‍त था।...
 पोस्ट लेवल : हिमाचल टिप्पणी लोक
   चित्रकृति: संजय राउतसमकालीन कविता पर जय प्रकाश का यह लेख कविता की अंतर्धारा को समझने में मदद करता है, वागर्थ के अप्रैल अंक से साभारबीसवीं सदी के अन्तिम दशकों में जो अभूतपूर्व साभ्यतिक परिवर्तन हुए, उनके चलते मानवीय संवेदना के क्षरण की प्रक्रिया मे...
             शिव कुमार जी से अंतिम भेंट मार्च महीने में जनवादी लेखक संघ की राम विलास शर्मा पर हुई गोष्‍ठी‍ में हुई. कमजोर थे पर अपने व्‍याख्‍यान में हमेशा की तरह करीब घंटा भर तो समा बांधा ही. ये चित्र उसी दिन के हैं...
    वरिष्‍ठ कवि चंद्रकांत देवताले जी से मिलने का पहला मौका आकशवाणी इंदौर के एक कार्यक्रम के सिलसिले में मिला जब हम लोग दूरदर्शन के गेस्‍ट हाउस में एक रात ठहरे. उनसे मिल कर बहुत अच्‍छा लगा. वे बहुत सहज हैं और दूसरे व्‍यक्ति को भी पूरी तरह से सहज बना देते...
पिछले दिनों समाज सुधारक और चिंतक असगर अजली इंजीनियर साहब का इंतकाल हो गया. कई साल पहले सुमनिका ने पहल के लिए उनसे एक इंटरव्‍यू लिया था. उनकी याद में यह इंटरव्‍यू सुमनिका के ब्‍लाग पर रखा है. शायद आप पढ़ना चाहें. तो यहां क्लिक करें. 
यह कहानी 1989 में मधुमति में छपी थी. उन्‍हीं दिनों एक और कहानी वर्तमान साहित्‍य में छपी थी.  दोनों तकरीबन उससे साल भर पहले साथ साथ ही लिखीं थीं. उन दिनों एक टांग में बहुत दर्द रहता था. बाद में पता चला कि यह साइटिका का दर्द है. पता तब चला जब स्लिप डिस्‍क हो क...
 पोस्ट लेवल : कहानी
कुछ अर्सा पहले मैंने अपने बचपन की कुछ यादें यहां पर आपके साथ साझा की थीं. उन्‍हें पढ़कर हिमाचल के ठियोग केहमारे मित्र और कवि मोहन साहिल इतने उद्वेलित हो उठे कि टिप्‍पणी लिखते लिखते अपने बचपन की गलियों में ही खो गए. अपनी बात कहने की मस्‍तीऔर जल्‍दबाजी के साथ यह मेल...
पिछले दिनों जयपुर लिटरेचर फेस्टिबल में आशीष नंदी के एक बयान से शुरू हुआ विवाद मीडिया में दूध में बाल की तरह उफना जिससे जरा सी तपन हुई और दुनिया उसी रफतार से चलती रही. इस तरह की घटनाओं का घटित होना हमारे समय में हो रहे आमूल परिवर्तनों के लक्षणों के उभर आने के जैसा ह...
पिछले दिनों जयपुर लिटरेचर फेस्टिबल में आशीष नंदी के एक बयान से शुरू हुआ विवाद मीडिया में दूध में उबाल की तरह उफना जिससे जरा सी तपन हुई और दुनिया उसी रफतार से चलती रही. इस तरह की घटनाओं का घटित होना हमारे समय में हो रहे आमूल परिवर्तनों के लक्षणों के उभर आने के जैसा...
संकट हिंदी कविता नहीं असल में हिंदी आलोचना का हैमुंबई ये प्रकाशित पत्रि‍का चिंतनदिशा में पिछले कुछ अंकों से चल रही बहस को आप यहां पढ़ते आए हैं. पत्रि‍का के  ताजा छपे अंक में इस बहस की अगली कड़ी के रूप में युवा कवि आलोचक अशोक कुमार पांडेय का लेख छपा है.  य...