ब्लॉगसेतु

संकट हिंदी कविता नहीं असल में हिंदी आलोचना का हैमुंबई ये प्रकाशित पत्रि‍का चिंतनदिशा में पिछले कुछ अंकों से चल रही बहस को आप यहां पढ़ते आए हैं. पत्रि‍का के  ताजा छपे अंक में इस बहस की अगली कड़ी के रूप में युवा कवि आलोचक अशोक कुमार पांडेय का लेख छपा है.  य...
यहां आप 'रमाकान्त-श्रीवास्तव कथा पुरस्कार' के बारे में, न‍िर्णायक दिनेश खन्‍ना का वक्‍तव्‍य, युवा कथाकार ओमा शर्मा की कहानी मेमना और उनका आत्‍मकथ्‍य पढ़ चुके हैं. अब इस प्रसंग की अंतिम कड़ी के तौर पर कथाकार-चित्रकार प्रभु जोशी का वक्‍तव्‍य पढ़िए जो उन्‍होंने पुर...
रमाकांत पुरस्‍कार से सम्‍मानित कहानी मेमना और उस के निर्णायक का वक्‍तव्‍य आप पढ़ चुके. अब पढ़िए कहानीकार ओमा शर्मा का वक्‍तव्‍य मैं रमाकांत स्मृति पुरस्कार की संयोजन समिति और इस वर्ष के निर्णायक श्री दिनेश खन्ना का अभारी हूं जिन्होंने इस वर्ष के इस कहानी पुरस्का...
रमाकांत कहानी पुरस्‍कार से सम्‍मानित कहानी दुश्‍मन मेमना और पुरस्‍कार के बारे में जानकारी के बाद अब पढ़िए इस कहानी के निर्णायक दिनेश खन्‍ना का वक्‍तव्‍य ओमा शर्मा की कहानी 'दुश्‍मन मेमना' मुझे एकदम आज की कहानी लगी. आज से मेरा मतलब है हमारे आज के शहर, महानगर मे...
रमाकांत छठे दशक के महत्वपूर्ण कथाकारों में से एक हैं. दो दिसम्बर १९३१ को जन्मे इस कथाकार के चर्चित कहानी संग्रह हैं- कार्लो हब्शी का संदूक, जिन्दगी भर का झूठ, उसकी लड़ाई, एक विपरीत कथा और कोई और बात. रमाकांत के महत्वपूर्ण उपन्यास हैं जुलूस वाला आदमी, छोटे छोटे...
  रमाकांत स्‍मृति पुरस्‍कार शायद एकमात्र पुरस्‍कार है जो साल भर के दौरान छपी सिर्फ किसी एक कहानी पर दिया जाता है. पिछले साल का पुरस्‍कार ओमा शर्मा को दुश्‍मन मेमना कहानी पर मिला है. बदलते हुए समाज के रग-रेशे को खोलती यह कहानी आप यहां पढ़िए     ...
बचपन की कुछ घटनाएं, कुछ चित्र, कुछ आवाजें, कुछ गंधें मेरे दिमाग में अटकी हुई हैं। वे मेरे लिए हाड़-मांस और सांस की तरह सच हैं। असल में कितनी सच हैं, पता नहीं।  क्योंकि जैसे एक बार सुनी हुई बात को बाद में याद के सहारे दोहराया जाए तो उसमें कुछ...
 पोस्ट लेवल : यात्रा यादें
साल का अंत आते आते सत्‍ता का चेहरा इतना पत्‍थर हो गयाकि पता नहीं वो पुलिस का था पाषाण का था तराशा हुआ राजसी ठाठ में लोग थे और भी लोग थे हाड़ मांस के जीते जागते आक्रोश और क्रोध से भरे हुए सत्‍ता ने बंद कर लिए अपने नेत्र जो वहां थे ही नहीं द्वार भी जो दरअसल कभी बने...
 पोस्ट लेवल : कविता
धीरोदात्त नायक की प्रतीक्षा करती और साथ ही उत्तेजक उत्तर-आधुनिकतावादी नारीवादी विमर्श करती पद्मिनी नायिका कथादेश में पवन करण और अनामिका की कविताओं पर जारी बहस में कात्‍यायनी का लेख. इस बहस में आप पहले प्रभु जोशी का लेख पढ़ चुके हैं.   रजा, &n...
बारह नवंबर दो हजार तीन को पिता का देहांत हुआ था. उसके बाद इस तरह कविता में उन्‍हें याद किया था. इस बार पखवाड़ा भर पहले ही बारह नवंबर बीती है. उनकी याद आ रही थी. ये कविताएं फिर पढ़ीं. कुछ तस्‍वीरें भी ढूंढीं. पर ज्‍यादा नहीं निकलीं. फिलहाल ये कविताएं देखिए.  &n...
 पोस्ट लेवल : कविता