ब्लॉगसेतु

आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ । है कंहा वह आग जो मुझको जलाए,है कंहा वह ज्वाल पास मेरे आए, रागिनी, तुम आज दीपक राग गाओ;आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ । तुम नई आभा नहीं मुझमें भरोगी,नव विभा में स्नान तुम भी तो करोगी, आज तुम मुझको जगाकर जगमगाओ;आज फिर से तुम बुझा दीपक जला...
तेवरी को विवादास्पद बनाने की मुहिम+रमेशराज................................................................................ग़ज़ल-फोबिया के शिकार कुछ अतिज्ञानी हिन्दी के ग़ज़लकार तेवरी को लम्बे समय से ग़ज़ल की नकल सिद्ध करने में जी-जान से जुटे हैं। तेवरी ग़ज़ल है अथवा नह...
मैं जीना चाहूं बचपन अपना,पर कैसे उसको फिर जी पाऊं!मैं उड़ना चाहूं ऊंचे आकाश,पर कैसे उड़ान मैं भर पाऊं!मैं चाहूं दिल से हंसना,पर जख्म न दिल के छिपा पाऊं।मैं चाहूं सबको खुश रखना,पर खुद को खुश न रख पाऊं।न जाने कैसी प्यास है जीवन में,कोशिश करके भी न बुझा पाऊं।इस चक्रव्...
तेवरी में गीतात्मकता +योगेन्द्र शर्मा --------------------------------------------------------------------------------------------------------                ग़ज़ल के जन्म के समय, लगभग सभी प...
कविता में ‘तेवरी प्रयोग’ साहित्य के लिए एक सुखद अनुभव*विश्वप्रताप भारती-----------------------------------------------------------------------------------                &nbsp...
तेवरी के तेवर को दर्शाती पत्रिका ‘तेवरीपक्ष’                                   -भगवानदास जोपट-----------------------------------------------------------------------------...
तेवरीकार रमेशराज, राजर्षि जनक की भूमिका में  *योगेन्द्र शर्मा ----------------------------------------------------------------------------------        कविवर निराला का कथन है-“कविता बहुजीवन की छवि है।“ तेवरी भी माँ सीता...
ग़ज़ल एक प्रणय गीत+रमेशराज---------------------------------------ग़ज़ल का अतीत एक प्रणय-गीत, महबूबा से प्रेमपूर्ण बातचीत’ के रूप में अपनी उपस्थित दर्ज कराते हुए साहित्य-संसार में सबके सम्मुख आया। ज्यादा भटकने की जरूरत नहीं है, ‘मद्दाह’ का शब्दकोष देख लीजिए, उ.प्र....