ब्लॉगसेतु

तू ही तो पालनहार हैतू ही तो खेवनहार है पर तू है कहाँ सुना है तू कण कण में है बच्चों के मन में है तो फिर उनकी रक्षा क्यों नहीं करता ??ईमानदार निश्छल इंसान की तू सुनता है ऐसा सुना था पर वो खून के आंसू रोते हैं तू उनकी सुनता क्यों नहीं ??सुना है तुझे सिर्फ दिल से याद...
आँखें बहुत कुछ देखती है कहती हैंजो देखती है समझती हैं उससे चहरे के भावबदलते हैंआँखों की भाषाबहुत मुश्किल हैपर गर मन से पढ़ा जाए तोपढ़ना बहुत आसान हैयहाँ मेरे जीवन से जुड़ीतीन परिस्थितियों कावर्णन करना चाहूँगीजो मुझे कभी भूलती नहींदेखी थी मैंने माँ की आँखेंबे...
अमृता का प्यारसदाबहार उसके गले का हार साहिर बस  साहिरउसका चैन उसका गुरूर उसकी आदत उसकी चाहतउसका सुकून उसकी मंज़िलसाहिर बस साहिरउसकी ताकत उसकी हिम्मत उसकी लेखनी उसकी कहानी साहिर बस साहिरउसका दिल उसकी सांसें उसकी जिंदगी उसकी बंदगीउसकी आशिकी उसकी ख़लबलीसाहिर बस स...
कैसे लिखूं कविताक्या लिखूं कीगरीब माएं मजबूरी मेंबेटियों को धन्धे परलगा देती हैं ताकि पेट भरता रहेक्या लिखूं कीकूड़े के ढेर से चुन करसड़ी गली चीज़ें खाते हैंबच्चे ताकि उनकीभूख मिट सकेक्या लिखूं कीफेक दी जाती है बेटियाँपैदा होते हीया कभी कभी पैदाइशीसे पहले गिरा दी...
अपने घर का एहसास कुछ अलग ही होता है ऐसी शांति मन को मिलती हैजिसे शब्दों में बयां करनानामुमकिन हैएक अजीब सा रूहानीसुकून महसूस होता हैहर एक ज़र्रे हर एककोने से प्यार हो जाता हैघर का ईट ईटलगता है हमारे एहसासोंसे जुड़ा हैअपना एक कोना मिलजाता हैजो कोई नहीं...
कभी कभी बसचुप चाप बैठ कर सोचने का मन होता है पर दिमाग उलझनों में उलझा रहता है और कुछ समझ नहीं आता तब ये अक्षर मेरे पास आते हैं और चुप चाप मेरे कंधे पर हाथ रख कर मेरे पास बैठ जातें हैं मैं अपने सारे सवाल सारे ख़याल सारी उलझनें इन अक्षरों के हवाले कर देती हूँजो स्वतः...
बंद करो रक्त पातबंद करो युद्ध की बातबंद करो अहंकार का ये खेलकहीं कोई भी मरे सब इंसान हैकम से कम ये तो देख माँ का भाल न लाल के खून सेलाल करोइंसान हो जानवरों सी बात न करोबंद करो रक्त पातबंद करो युद्ध की बात#रेवा
हाँ मैं हूँ एक माँखड़ी ढाल की तरहअपने बच्चों के साथ उनके हर तकलीफ़ मेंडट कर सामना करने कोउन्हें बचाने को तैयारचाहे हालात कैसे भी होचाहे मुसीबत कैसी भी होपर फिर भी हूँ इन्सानउस दिन उस शामकुछ मिनट पहले हीदेखा था अपनी दस साल कीबच्ची को खेलते हुएऔर बाद के कुछ मिनटो...
उलझे रहे हम ज़िन्दगी के सफर में इस कदर न दिन की रही खबर न ही शाम का रहा ख्यालथक कर हर रात बस ख़्वाबों की गोद में पनाह ले ली कभी देखा ही नहींसुबह की सिंदूरी रोशनी कभी सुना ही नहीं पंछियों का कलरव कभी महसूस नहीं किया सुहाना मौसम भागते रहे बस हर रोज़ चिन्ता लिए कैसे...
कभी ध्यान सेदेखा है उन भिखारियों को जो कटोरा लेकर पीछे पीछे आते हैं गिड़गिड़ाते रहते हैं किसी भी तरह पीछा नहीं छोड़ते चाहे उनका अपमान करो या डांट लगाओ तरह तरह से कोशिश करते रहते हैं वैसा ही हाल होता है उन लोगों का जो वोट मांगते हैं तरह तरह से प्रलोभन देते हैं ५ साल मे...