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नींद आ रही है पर लेटुंगा नहीं। क्योंकि पता है लेटने पर भी वह आने वाली नहीं है। इधर वह ऐसे ही परेशान करने लगी है। करवट-करवट बस उबासी आती है नींद नहीं। और फ़िर जब यादें खुली आँखों से आस पास तैर रही हों तो सोने की क्या ज़रूरत। ऐसे ही कल हम मनाली थे। माल रोड घूम रहे थे।...
जगहें वही रहती हैं उनके किरदार बदल जाते हैं। हमारा कॉलेज उसी जगह था जहाँ बीते तीन महीने से उसे देखते आ रहे थे। कहीं से भी थोड़ा भी अलग नहीं लग रहा था। पर कुछ उस दिन में ही था जो उसे अंदर ही अंदर बदल रहा था। शाम धीरे धीरे वहाँ उतर रही थी। जैसे उस जगह पहले कभी उतरते न...
पता नहीं कैसे अजीब से दिन हैं। बिलकुल ठहरे से। उदास से। बेतरतीब। कहीं कोई मुस्काता बहाना भी नहीं। इतना लिखकर मन कर रहा है लैपटाप बंद कर थोड़ी देर सो जाऊँ। मन खाली-खाली सा है। पता नहीं यह कैसा भाव है। कैसा करता जा रहा है। शनिवार से भूख कम हो गयी है। खाने का मन नहीं क...
किसी खाली सुनसान स्टेशन के ‘प्लेटफ़ॉर्म’ की तरहउस अकेलेपन में इंतज़ार कर देखना चाहता हूँकैसा हो जाता होगा वह जब कोई नहीं होता होगाकोई एक आवाज़ भी नहींकहीं कोई दिख नहीं पड़ता होगाबस होती होगी अंदर तक उतरती खामोशीदूर तक घुप्प अँधेरे सा इंतज़ार करता ऊँघता ऊबताकि इस अँधेरे...
सुबह से कुछ लिख लेना चाहता हूँ। कुछ बेचैन सा। बार-बार आता हूँ चला जाता हूँ। लिख नहीं पाता। समझ नहीं पाता क्या लिख लेना है। क्या है जो छूटे जा रहा है। जिसे लिखे बिना थोड़ा डिस्टर्ब सा हूँ। ऐसा नहीं है के मौसम गरम है। इधर आसमान में बादल हैं। ठंडी हवा चल रही है। दिमाग...
हमारे घर में मिट्टी का घड़ा इसलिए नहीं है के हम अतीतजीवी हैं और हमने घर में जगह न होने को बहाने की तरह ओढ़ लिया है। यह विशुद्ध हमारे चयन और इच्छा का निजी मामला है। इसमे किसी भी तरह के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेंगे। फ़िर ऐसा भी नहीं है कि हम जहाँ भी जाते हैं घड़े का...
अपनी बात कहने से पहले थोड़ा पीछे बचपन की तरफ़ जाता हूँ जहाँ मेनका गाँधी का उदय होना अभी बाकी है। वहाँ की कोई याद नहीं है कि कभी लाल किले पर कोई सर्कस लगा हो और वहाँ शेर की दहाड़ सुनाई दी हो। शायद छोटे रहे थे जब आखिरी बार इन जानवरों वाला सर्कस देखा था। भूल गए होंगे। बह...
पता नहीं तुम कैसे होते गए होगे। तुमने बिन कहे मना किया होगा। थोड़ा झिझके होगे। थोड़े पैर लड़खड़ाए होंगे। बिलकुल जुबान की तरह वह भी कुछ कहते-कहते रुक गए होंगे। कैसे कहूँ। यही सोचते-सोचते तुम बस खड़े रह गए। चेहरा किसी नयी नवेली दुल्हन की तरह शरमाया सा नहीं लग रहा। बस तुम्...
आज उस तस्वीर वाले ‘मैं’ को बीतते सालों में यादकर बहुत दूर बैठा हूँ। इसके बाद आगे क्या लिखूँ समझ नहीं पा रहा। इन बीतते सालों में कैसा होता गया हूँ। शायद कुछ कुछ जानता हूँ। शायद नहीं भी जानता होऊंगा। किसी का भी अपने कल से आज में आना पूरी तरह से व्यक्तिनिष्ठ है। उसके...
पिछला पन्ना, दिल तोड़ देने वाली फ़िल्म..ख़ुद को थोड़ी देर सुदीप की जगह रखकर देखने का पहला मिनट बीता नहीं कि अपने आप से कोफ़्त होने लगी। जिसके साथ ज़िन्दगी बिताने के दिन बुन रहा हूँ, उसे कह दूँ, के अपने हिस्से के सपनों को पूरा करने के लिए वह उस अमीर कंपनी के मालिक से शादी...