ब्लॉगसेतु

जब हम सब खाना खा लेते हैं, तब सोचने लगता हूँ कि वह जल्दी से बर्तन माँज लें और हम दोनों हर रात कहीं दूर निकल आयें। हम दोनों की बातें पूरे दिन इकट्ठा होती गईं बातों के बीच घिरकर, झगड़ों के बगल से गुज़रकर सपनों के उन चाँद सितारों में कहीं गुम हो जातीं। हर रात ऐसा ही होन...
हम कभी नहीं सोचते, पर हो जाते हैं। कितने दोस्त बन जाते, इसी सब में। पर फ़िर भी हम तो दोस्त उसी के बनना चाहते। मन मार लेते। सब साथ दिखते। पर हम उसके साथ होना चाहते। कुछ न बोलते हुए भी सब बोल जाते। पर वह कहीं न होती। हम कहीं न होते। जगहें वहीं रह जातीं। हम हम नहीं रह...
आज कल यह तर्क बहुत चल रहा है कि जनता भी विरोध दर्ज़ करना चाहती है, पर उसके पास सुघड़ भाषा और उसकी पिच्चीकारी करती मुहावरेदार शैली नहीं है। वह सब, जो इसकी ओट में पीछे खड़े हैं, इस बहाने से आम जनता के प्रवक्ता बनकर उभरे हैं। वह ख़ुद इस पद पर नियुक्त कर लिए गए हैं। यह संग...
पता नहीं अंदर ख़ुद से कितने झूठे वादे कर रखे हैं।एक में हम शादी के बाद पहली बात अकेले घूमने निकलने वाले हैं। में सारी ज़रूरी चीजों में सबसे पहले कैमरे को संभालता हूँ। जिद करके उधार ही सही नौ हज़ार का डिजिटल कैमरा ले आता हूँ। कहीं पहाड़ पर जाएँगे, तब अपनी साथ वाली तसवी...
मैं कभी कुछ नहीं बोलूँगा, बस चुप रहूँगा। आप जब कुछ कहेंगे, तब मैं कुछ नहीं कहूँगा। आप देखने को कहेंगे, मैं बिलकुल नहीं देखुंगा। आपकी सहजता को असहजता में नहीं बदलने दूँगा। आप सहज रहें इसलिए खुद ही असहज होता रहूँगा। कुछ बोलने से पहले कुछ नहीं बोलूँगा। आपके लिए अपना...
हज़रत निज़ामुद्दीन घंटा भर पहले पहुँचकर वह क्या-क्या कर सकता है, इसकी लिस्ट वह कई बार बनाकर मिटा चुका था। हर डूबती शाम, उसका दिल भी डूब जाता। जिस कमरे पर वह साल दो हज़ार दो से रह रहा था, उसे अपने ही गाँव के एक लड़के को दिलाकर एक ठिकाना बचाए रखने की ज़िद काम नहीं आई। हर...
पता नहीं कभी-कभी क्या होता है, हम चाहकर भी नहीं समझ पाते। शायद तभी उन बीत गए दिनों में लौट कर उन्हें दुरुस्त करने की ज़िद से भर जाते होंगे। अगर ऐसा न होता तब मुझे भी हलफ़नामे की तरह दोबारा उन बातों पर गौर करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। सोचता हूँ, अगर मेरे मन में वह ख़याल दो...
वर्माजी देखने में साधारण से मास्टरजी लगते हैं। जैसे विनोद कुमार शुक्ल की कविता से अभी-अभी बाहर निकले हों। जो उनके घर कभी नहीं आएँगे, वह उनसे मिलने उनके पास चले जायेंगे। पास पहुँचकर वह सिर्फ़ हालचाल लेंगे। और कुछ नहीं कहेंगे। ऐसे ही वे हमारे बचपन में मास्टर बनकर आए।...
कभी-कभी सोचता हूँ हम भाग कर शादी कर लेते तो क्या होता? मेरे पास आज तक नौकरी नहीं है। इन दोनों बातों में प्रश्न-उत्तर वाला संबंध नहीं है फ़िर भी दोनों एक-दूसरे का जवाब हैं। यह दोनों बातें आपस में ऐसे गुथी हुई हैं, जैसे तुम्हारी कल शाम वाली बँधी चोटियाँ। उनमें गुथे हु...
डिजिटल इंडिया ऐसी तकनीक साबित होगी, जिससे अब अंतरजातीय विवाह सुगमता से होने लगेंगे, जातिवाद देश से उखड़ जाएगा। फ़ेसबुक मेट्रीमोनियल साइट में तब्दील होने जा रहा है। कोई मुजफ्फरनगर, बथानी टोला अब नहीं होगा। कोई किसी के लिए हिंसक शब्दावली का इस्तेमाल नहीं करेगा। अब यहाँ...