ब्लॉगसेतु

तुम जब भी उदास होते हो मै उन वजहों को खोजने लगती हूँ जो बन जाती है तुम्हारी उदासी की वजह और उन ख़ूबसूरत पलों को याद करती हूँ जो मेरी उदासी के समयतुमने पैदा किये थेमुझे हँसाने व रिझाने के लियेकाश! कभी तो मिटेंगे एक साथ ये उदासी के काले बादलज...
 पोस्ट लेवल : उदासी कविता रिश्ते
रिश्ते निभाये जा रहे हैं सीलन, घुटन और उबकाई के साथरिश्ते निभाये जा रहे हैं दूषित बदबूदार राजनीति के साथरिश्तों में नही दिखती जरूरत अपनापनरिश्ते दिखने लगे हैं दंभ के चौले सेमेरी तमाम कोशिशें नाकाम करने की ख़्वाहिश मेंरिश्तों ने ओढ़ ली है काली स्याह चादरडर...
*फिर मिलेंगे*ये मिलना मिलाना या फिर कहना कि फिर मिलनाया मिलने के लिये बस कह देनाकि फिर कब मिलोगेमिलने का एक दस्तूर है बसमिलने को जो मिलते हैंवे कहते कब हैं मिलने कीमिल ही जाते हैं मिलने वालेजिनको चाह है मिलने कीकहने भर से गर कोई मिलतामिल ही जातान रहत...
 बढे जा रही हैं उम्र और मेरी उम्र के साथ-साथ बढ रहे हो तुम भीऔर तुम्हारे साथ जी रही हैं मेरी उम्मीदें, मेरे ख्वाबमै एक अलग ढँग की माँ हूँशायद अपनी माँ से भी अलगमैने तुम्हें भी पा लिया था बचपन के अनछुये ख्वाबों मेंवो ख्वाब जो शायद कम ही...
इंतज़ार तेरे पास आने काइंतज़ार तुझे देख भर लेने काइंतज़ार तुम्हे गले से लगा लेने काइंतज़ार तुम्हारा माथा चूम कर हौले से हाथ दबाने काइंतज़ार यह कहने का कि मै हूँ तुम्हारे लियेइंतज़ार तुझसे मिलने कामिलकर शिकायत करने काकि तुम अब तक अकेले कैसे रहेशिकायत यह भी कितुमको अ...
सैंड टू ऑल की गईतुम्हारी तमाम कविताओं मेंढूँढती हूँ वो चंद पंक्तियाँजो नितान्त व्यक्तिगत होंगीजो लिखी गई होंगीकिसी ख़ास मक़सद सेकिन्हीं ख़ास पलों मेंसिर्फ मेरे लियेनहीं होगा उन परकिसी और की वाह वाही का ठप्पा भीलेकिनसैंड टू ऑल की गई सारी कवितायेंबिछी पड़ी हैं सबके आ...
मेरी नर्म हथेली पर अपने गर्म होंठों के अहसास छोड़ता चल पड़ता है वोऔर मै अन्यमनस्क सीदेखती हूँ अपनी हथेलीकाश वक्त रूक जाये,बस जरा सा ठहर जायेलेकिन तुम्हारे साथ चलते घड़ी की सुईयां भी दौड़ती सी लगती है धीरे से मेरा हाथ मेरी गोद में रखकर,हौले से पी...
बहुत दिन हुए नहीं लिख पाईलिखती तो तुम भी जान पातेवो हजारों अनकही बातेंजो रात दिन बुनती हैं ख्वाबख्वाब जिसमें होते हो तुम और तुम्हारा खयालजब हम मिले थे पिछली दफ़ामेरे खयालों की पोटली सिमट गई थीतुम्हारे इर्द-गिर्दचुपचाप खामोशी के साथलेकिन मैमै नहीं रह पाई थी खामोशबतिय...
दिन बहुत हुये...दिन नहीं साल हुये हैंहाँ सालों की ही बातें हैजाने कितनी मुलाक़ातें हैगिन सकते हैं हम उँगलियों पर लेकिनदिन...महिने...साल...गिन लेने के बाद भीगिनकर बता सकोगे!बाल से भी बारीक उन लम्हों को जो बिताये है तुम्हारे साथ और साथ बिताने के इंतज़ार में...
दोस्तों फ़ेसबुक पर विचित्र- विचित्र लोग बैठे हैंं, इधर उधर से कुछ भी उठाते हैं और लाइक शेयर बटोरते हैं, अभी एक महाशय  ने कहा कि क्या मै आपके अल्फ़ाज़ से बनी कविता मेरे नाम से पोस्ट कर सकता हूँ तो एक बार मैने सोचा क्या हर्ज़ है करने में, लेकिन मेरे ये अल्फ़ाज़ क...