ब्लॉगसेतु

  कलह का मूल कारण हालाँकि कात्यायनी ही थीं। कात्यायनी के वाक्यस्फुलिंग जब भैरव के चित्त-बारूद पर गिरकर उसे विस्फोटक बना रहे थे, उसी समय अगर हॉकर हीरालाल के साथ भैरव की आमना-सामनी नहीं होती, तो यह काण्ड नहीं घटता। कात्यायनी की बहुत दिनों से इच्छा थी नये चलन की...
मिस्टर मुखर्जी कब जो हमारे अड्डे में आकर शामिल हो गये थे, ठीक से याद नहीं। सिर्फ इतना ही याद है कि स्वर्गीय मधु मामा एक दिन उनको हमारे अड्डे में लाये थे। उसके बाद से बीच-बीच में वे धूमकेतु की तरह हमारे अड्डे में आना-जाना करते थे। उनका घनिष्ठ परिचय हममें से कोई नही...
”छोकरे की अभी ठीक से मूँछें भी नहीं उगीं, और अभी से यह काण्ड! मूँछें उगने पर पता नहीं- “इतना कह कर दत्त महाशय ने अपनी मूँछों पर दृष्टिपात किया और एक पका बाल तोड़ कर सामने बैठे विश्वास से बोले- ”और कितने हैं देखना भई! एह, इस तरह पकने से तो दो दिनों में ही सब साफ हो...
प्रायः दस साल पहले की बात है।आसनसोल स्टेशन पर ट्रेन की प्रतीक्षा में बैठा था। मेरे पास ही एक सज्जन बैठे हुए थे। उनके हाथों में एक किताब थी। खासा मोटा उपन्यास था। आलाप-परिचय होने पर पता चला, सज्जन को उनकी ट्रेन के लिए दिनभर प्रतीक्षा करनी है।मेरी ट्रेन में भी तीन घण...
विदा लेने से पूर्व विनम्र नमस्कार कर वे सज्जन बोले, ”उस मोड़ पर डिस्पेन्सरी खोला हूँ मास्साब, कभी पधारियेगा- “”अच्छा।“...स्मृतिपटल पर कई छवियाँ तैरने लगीं। पुरातन छवियाँ। ***मैं ट्यूशनी करता था। बी.ए. में कई बार फेल होने के कारण ही हो, या स्वामी चिन्मयानन्द के सत...
बैठकर, सोकर, अखबार पढ़कर, ताश खेलकर, अड्डा मारकर, परचर्चा व परनिन्दा कर-कर के विरक्त हो गया। शान्ति नहीं मिल रही है। असली कारण है- अर्थाभाव! मुझे जो करना था, वह कर चुका हूँ। परीक्षा पास कर चुका हूँ, बहुत स्थानों पर नौकरी के लिए दरख्वास्त कर चुका हूँ- यहाँ तक कि इन्...
फ्रेंचकट दाढ़ी, देवानन्द टाईप जुल्फें, पहनावा विचित्र लुंगी, मुँह में सर्वदा प्यांज-लहसु की गन्ध- ऐसे व्यक्ति का नाम है, राधावल्लभ। पितामह-प्रदत्त नाम। कहते हैं कि रुस में नाम बदलने की सुविधा है। अपने देश में भी अनेक छात्र-छात्रायें मैट्रिक परीक्षा देने से पहले अपनी...
त्रिगुणानन्द बाबू सिर्फ त्रिगुण नहीं, बल्कि बहुत सारे गुणों से सम्पन्न थे। प्रचण्ड धार्मिक- प्रचण्ड संयमी, जबकि उम्र चालीस से कम। शरीर पर वे बहुत ध्यान देते थे। प्रतिदिन मुग्दर भाँजते थे- तीनबार दन्तधावन करते थे- दोनों बेला स्नान करते थे। पहलवान-जैसा स्वास्थ्य था।...
सुन्दर ज्योत्स्ना। चारों तरफ जनमानस की आहट नहीं। गहन रात्रि। दूर से नदी की कल-कल ध्वनि तैरती आ रही है। निर्जन प्रान्त में अकेला खड़ा हूँ। स्वप्न-विह्नल नेत्रों से देख रहा हूँ- ज्योत्स्ना में सारा संसार डूबा जा रहा है। कुत्सित वस्तुएं भी सुन्दर हो उठी हैं। वह कचरे का...
       सुलेखा रो रही है।गहन रात्रि, बाहर चाँदनी छिटकी हुई है। ऐसी स्वप्नमयी चाँदनी में दुग्धफेनित बिस्तर पर औंधे मुँह लेटकर षोड़षी तन्वी बस रोये जा रही है। अकेले- कमरे में और कोई नहीं है। ज्योत्स्ना के एक टुकड़े ने खिड़की के रास्ते चुपके से कमरे मे...