ब्लॉगसेतु

(पोस्ट कल की है) एक फिल्म आयी थी- 'कल आज और कल'। तीन पीढ़ियों पर आधारित। बुजुर्ग पीढ़ी का प्रतिनिधित्व पृथ्वीराज कपूर कर रहे थे, अधेड़ पीढ़ी का राज कपूर और युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व रणधीर कपूर कर रहे थे। तीनों वास्तविक जीवन में भी दादा, पिता और पुत्र थे। फिल्म की कहान...
       जब हम नौवीं-दसवीं में थे, तब हमारे क्लब का नाम "पैन्थर्स क्लब" हुआ करता था। हमलोग बाकायदे एक छोटा-सा पुस्तकालय चलाया करते थे। जब पुस्तकालय का एक साल पूरा हुआ, तब हमलोगों ने बाकायदे एक "स्मारिका" भी प्रकाशित करवाया था। 1984 में...
       पता चला कि आज विश्व रेडियो दिवस है।        सबसे पहले तो बात पिताजी और चाचाजी की। दोनों के पास छोटे-छोटे ट्रान्जिस्टर थे- शायद जापानी। जब मेरी दोनों दीदी बड़ी हुई और दोनों ने रेडियो सुनना शुरु किया,...
       परसों शाम जब हम 'बिन्दुवासिनी पहाड़' की ओर टहलने गये थे, तब देखे थे कि 'झिकटिया चौक' के बाद से सड़क चमकीले रंगीन कागजों से सजी हुई थी। साथ ही, आस-पास की आदिवासी बस्तियों से मादुल (मृदंग) की आवाजें भी आ रही थीं।    ...
       "कजंगल" एक त्रैमासिक पत्रिका का नाम था। बात 1981-83 की है। इसे हमारे बरहरवा का "अभियात्री" क्लब प्रकाशित करता था। "सॉरेश सर" यानि आनन्द मोहन घोष इस क्लब के एक तरह से सर्वेसर्वा हुआ करते थे। यह पत्रिका थी तो बँगला की, लेकिन इसमे...
बहुत पहले पिताजी ने हमें एक तस्वीर दी थी और कहा था इससे कुछ और तस्वीरें बनवा दो। तस्वीर के पीछे बाकायदे सभी लोगों के नाम लिखे थे। जहाँ तक हमें याद है, पड़ोस के रुपश्री स्टुडियो की मदद से हमने उस छोटी तस्वीर से तीन या चार बड़ी तस्वीरें बनवा दी थीं। तस्वीरें बँट गयी-...
       ऊपर जो तस्वीर आप देख रहे हैं, वह 25 जनवरी के दिन की तस्वीर है। साल- 1996; स्थान- मेरठ। जहाँ तक फोटोग्राफर की बात है, किसी पत्र-पत्रिका के प्रोफेशनल फोटोग्राफर थे वे। हिन्दी पंचांग के हिसाब से, उस दिन बसन्त-पञ्चमी थी।  &nbs...
शायद 2003 की बात होगी। हम छुट्टी लेकर घर आये थे कि अपने घर के पीछे की तरफ परती जगह पर अपने लिए अलग से एक बसेरा बनवा लें, क्योंकि दो साल बाद ही हमें सेवा से अवकाश लेना था। जो राजमिस्त्री आया, वह काम के लिए राजी तो हुआ, लेकिन उसका कहना था कि वह अगले महीने से काम शुर...
2020 का नया साल हमने सुन्दरबन के जंगलों में बिताया। स्टीमर पर।             सुन्दरबन के परिचय में कुछ कहने की जरुरत तो खैर नहीं है, फिर भी बता दिया जाय कि यह करीब 10,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला विश्व का सबसे...
हमें नहीं पता था कि वर्ष में एक दिन ऐसा भी होता है, जिस दिन आँवले के पेड़ के नीचे भोजन करने की परम्परा है। आज पहली बार पता चला और पहली बार हमने आँवले के पेड़ के नीचे भोजन किया।        दिवाली के बाद अभी-अभी तो छठ महापर्व की गहमा-गहमी सम...