ब्लॉगसेतु

 शेष जो कुछ था हरा उसको कुतर खाने लगे टिड्डियों के दल फ़सल पर फिर नज़र आने लगे।बढ़ रहे हैं वे मुहल्ले की तरफ लेकर जुलूसख़बर क्या फैली घरों में लोग घबराने लगे।क्या कहें इस सभ्यता के दौर को क्या नाम दें जो लुटेरे हैं उन्हीं की लोग जय गाने लगे।इस सियासत में नहीं बहत...
आजकल हमलोग बच्चों की तरह लड़ने लगे चाबियों वाले खिलौने की तरह लड़ने लगे। ठूँठ की मानिन्द अपनी जिन्दगी जीते रहे जब चली आँधी तो पत्तों की तरह लड़ने लगे। कौन-सा सत्संग सुनकर आये थे बस्ती के लोग लौटते ही दो क़बीलों की तरह लड़ने लगे। हम फ़क़त शतरंज की चालें हैं उनके वास्ते दी...
तेरा बाज़ार तो महँगा बहुत है लहू फिर क्यों यहाँ सस्ता बहुत है। सफ़र इससे नहीं तय हो सकेगा यह रथ परदेश में रुकता बहुत है। न पीछे से कभी वो वार करता वो दुश्मन है मगर अच्छा बहुत है। नहीं क़ाबिल गज़ल के है ये महफ़िल यहाँ पर सिर्फ़ इक-मतला बहुत है। चलो फिर गाँव का आँगन तलाशें...
वो आदमी है तो हुआ कीजे वो आदमी रहे दुआ कीजे।सिर्फ होने से कुछ नहीं होता आपने होने का हक़ अदा कीजे। कुछ तो भीतर की घुटन कम होगी खिड़कियों की तरह खुला कीजे। घर ही दीवारों से बने माना घर में दीवार हो तो क्या कीजे। हंसते-हंसते ही आंख भर आये इतना खुलके भी न हंसा कीजे।हमन...
ख़ुद आग लगाता है जो घर अपना बसाकर क्या पाओगे उस शख़्स की हस्ती को मिटाकर। जिस शख़्स पे तुम फेंक रहे आज हो पत्थर कल उस पे गये लोग हैं कुछ फूल चढ़ाकर। वो मोम की बुलबुल को कहां लेके चला है यूं आग के दरिया में सफ़ीने को बहाकर। वो राख से पोशिदा है इक शोला-ए-ग़ैरत मत रक्खो उसे...
इक तरफ बाग़ी मशालें इक तरफ शाहेज़हां देखना है यह कहानी ख़त्म होती है कहां। पत्थरों का ख़ौफ होगा शीशमहलों के लिए काटकर चट्टान को हमने बनाया है मकां। बिजलियों पर टिप्पणी भी दूं मुझे यह हक़ नहीं गो चमन में एक मेरा ही जला है आशियां। किस बहर में इस नगर की धड़कनें बांधू इधर ह...
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाय जिसमें इन्सान को इन्सान बनाया जाये। जिसकी ख़ुशबू से महक़ जाये पड़ोसी का भी घर फूल इस क़िस्म का हरसिम्त खिलाया जाये। आग बहती है यहाँ गँगा में झेलम में भी कोई बतलाये कहाँ जा के नहाया जाये।  प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए हर अ...
करने चले थे होम मगर हाथ जल गये हम यूं हंसे कि आंख से आंसू निकल गये। दिखते हैं सबसे पीछे यहां आज वो ही लोग मरने के दिन जो मौत से आगे निकल गये। वो दिन जो ज़िन्दगी के गुजारे तेरे बग़ैर कुछ अश्क बन गये तो कुछ गीतों में ढल गये। दैरो-हरम की राह में जो लड़खड़ाये पांव आये वो म...
आदमी ख़ुद को कभी यूँ ही सजा देता है रोशनी के लिए शोलों को हवा देता है।ख़ून के दाग़ हैं दामन पे जहाँ सन्तों के तू वहाँ कौन से 'नानक' को सदा देता है। एक ऐसा भी वो तीरथ है मेरी धरती पर क़ातिलों को जहाँ मन्दिर भी दुआ देता है। मुझको उस वैद्य की विद्या पे तरस आता है भूखे लो...
इन दिनों राजपुरुषों को रिझाया जा रहा है राग-दरबारी सुनाया जा रहा है। बदजुबानों चुप रहो दिल्ली शहर में इन दिनों उत्सव मनाया जा रहा है।ये प्रथा है धर्मप्राणों की चिरन्तन दूध साँपों को पिलाया जा रहा है। बी सियासत गाँव में मुजरा करेंगी गीत को घुँघरु बनाया जा रहा है। चा...