ब्लॉगसेतु

हमारे भारत में ‘अभिनय सम्राट’ कहते ही लाखों-करोड़ों के दिलो-दिमाग में एक ही नाम कौंध जाता है, और वो है दिलीप कुमार का. दिलीप कुमार ने फ़िल्म ‘देवदास’ में पारो से बिछड़ने के गम में शराब क्या पी ली, लोगबाग जानबूझ कर अपनी-अपनी प्रेमिकाओं से बिछड़कर उनके गम में शराब पीने ल...
मेरे बाल-कथा संग्रह ‘कलियों की मुस्कान’ की एक कहानी. इस कहानी को मेरी दस साल की बेटी गीतिका सुनाती है और इसका काल है – 1990 का दशक ! पाठकों से मेरा अनुरोध है कि वो गीतिका के इन गुप्ता अंकल में मेरा अक्स देखने की कोशिश न करें.बैलेन्स्ड डाइटभगवान ने कुछ लोगों को कवि...
जैन परिवारों में आम तौर पर शाकाहार जीवन का एक अभिन्न अंग होता है. जैनों में शाकाहार का मतलब होता है – बिना लहसुन-प्याज़ का बना भोजन.पुराने ज़माने में हमारे परिवार की ज़्यादा भक्त किस्म की महिलाएं तो अशुद्धता के भय से बाज़ार से लाया गया कुछ भी पकवान खाती ही नहीं थीं और...
एक और मीसा-बंदी25, जून 1975 को इमरजेंसी की घोषणा हुई.  आए दिन सरकार का विरोध करने वालों को 'मीसा’ (‘मेंटेनेंस ऑफ़ इंडियन सिक्यूरिटी एक्ट’) के तहत गिरफ़्तार कर के जेलों में ठूंसा जा रहा था. ‘मीसा’ का यह तानाशाही फ़रमान निहायत ही खतरनाक था. इसके अंतर्गत संविधान के...
मॉडल जेल - लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रवक्ता के रूप में मेरे सेवा-काल का दूसरा साल था. इमरजेंसी के अत्याचार अपने शबाब पर थे. हर जगह एक अनजाना सा खौफ़ क़ायम था. 'मीसा’ (‘मेंटेनेंस ऑफ़ इंडियन सिक्यूरिटी एक्ट’) के नाम पर पुलिस किसी को भी, कभी भी, पकड़ कर ले जा सकती थी. ‘मीस...
इमरजेंसी – लखनऊ यूनिवर्सिटी से जब मैं मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास में एम. ए. (1971-73) कर रहा था और तब जब कि मैं वहां शोध छात्र था, लखनऊ विश्वविद्यालय और उसके तथाकथित नंबर एक बॉयज़ हॉस्टल, हमारे लाल बहादुर शास्त्री हॉस्टल का बहुत बुरा हाल था. हर जगह गुंडा-राज थ...
16 जून की शाम को मुज़फ्फ़रपुर में फैले चमकी बुखार के सम्बन्ध में होरही एक ज़रूरी मीटिंग में स्वास्थ्य-मंत्री द्वारा उठाए गए दो अहम सवाल -1. 'लेटेस्ट स्कोर क्या है?'2. 'क्या रोहित शर्मा की सेंचुरी हो गयी?'XXXXXXXXXXXXXमुज़फ्फ़रपुर में श्री शिवमंगल सुमन की अमर रचना – ‘वरद...
साम्यवादी मूल्यों की स्थापना –पिताजी के हर तीन साल में तबादले की वजह से हम बच्चों को नए परिवेश में खुद को ढालने की चुनौती होती थी. हर बार नए दोस्त और नए दुश्मन बनाने पड़ते थे. 1965 में जब पिताजी का रायबरेली से बाराबंकी तबादला हुआ तो मेरा एडमिशन बाराबंकी के गवर्नमेंट...
नन्हीं कलियाँ, बिन खिले, मुरझा गईं !वहशियत है मुल्क में, समझा गईं !बच्चियां हिन्दू की हों,मुसलमान की होंयाकिसी अन्य धर्मावलम्बी की !किसी से बदला लेने के लिए -याकिसी को सबक सिखाने के लिए -उन मासूमों का अपहरण,उन का बलात्कार,और उन की हत्याकरना ज़रूरी क्यों हो जाता है?
उसूलों पर जहाँ आँच आए, टकराना ज़रूरी है,जो ज़िंदा हो, तो फिर ज़िंदा नज़र आना, ज़रूरी है.वसीम बरेलवीमुर्दा-दिल क्या खाक़ जिया करते हैं -जो हिम्मत कर के लब खोले, तो जाना, मैं भी ज़िन्दा हूँ,मैं वरना, सांस लेते, एक मुर्दे के, सिवा क्या था.एक गुस्ताख़ी और -दाल-रोटी, चंद क...