ब्लॉगसेतु

साम्यवादी मूल्यों की स्थापना –पिताजी के हर तीन साल में तबादले की वजह से हम बच्चों को नए परिवेश में खुद को ढालने की चुनौती होती थी. हर बार नए दोस्त और नए दुश्मन बनाने पड़ते थे. 1965 में जब पिताजी का रायबरेली से बाराबंकी तबादला हुआ तो मेरा एडमिशन बाराबंकी के गवर्नमेंट...
नन्हीं कलियाँ, बिन खिले, मुरझा गईं !वहशियत है मुल्क में, समझा गईं !बच्चियां हिन्दू की हों,मुसलमान की होंयाकिसी अन्य धर्मावलम्बी की !किसी से बदला लेने के लिए -याकिसी को सबक सिखाने के लिए -उन मासूमों का अपहरण,उन का बलात्कार,और उन की हत्याकरना ज़रूरी क्यों हो जाता है?
उसूलों पर जहाँ आँच आए, टकराना ज़रूरी है,जो ज़िंदा हो, तो फिर ज़िंदा नज़र आना, ज़रूरी है.वसीम बरेलवीमुर्दा-दिल क्या खाक़ जिया करते हैं -जो हिम्मत कर के लब खोले, तो जाना, मैं भी ज़िन्दा हूँ,मैं वरना, सांस लेते, एक मुर्दे के, सिवा क्या था.एक गुस्ताख़ी और -दाल-रोटी, चंद क...
‘पयाम-ए-आज़ादी’ -1857 के विद्रोह में शायद अंतिम बार धार्मिक और क्षेत्रीय संकीर्णता से परे, हमारे देश में, देशभक्ति की निर्मल धारा बही थी. इस विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार करने में दिल्ली के लीथो प्रेस से फ़रवरी, 1857 से मुग़ल शाही घराने के मिर्ज़ा बीदर बख्त द्वारा उर्दू-ह...
नेहरु जी की बिटिया और हमारी माँ -हमारे घर में इंदिरा गाँधी की पहली पहचान नेहरु जी की बिटिया के रूप में थी. हमारी माँ तो इंदिरा गाँधी की ज़बर्दस्त प्रशंसिका थीं. अख़बारों या पत्रिकाओं में इंदिरा गाँधी की फ़ोटो आती थी तो माँ का एक ही कमेंट होता था – ‘हाय ! कितनी सुन्दर...
जोश मलिहाबादी का एक शेर है -सब्र की ताक़त जो कुछ दिल में है, खो देता हूँ मैं,जब कोई हमदर्द मिलता है तो, रो देता हूँ मैं.भारतीय लोकतंत्र के सन्दर्भ में मैंने इस शेर का पुनर्निर्माण कुछ इस तरह किया है -सब्र की ताक़त जो कुछ दिल में है, खो देता हूँ मैं,वो इसे जनतंत्र कहत...
सज़ा-ए-मौन -'( 'पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई' गीत की तर्ज़ पर )पूछो न कैसे, मैंने बैन बिताया,इक जुग जैसे इक पल बीता, जुग बीते मोहे चैन न आया,मरघट जैसे सन्नाटे में, रहना हरगिज़ रास न आया.दाल-ए-सियासत फीकी लागे, गाली का नहिं छौंक लगाया,मुनि दुर्वासा की संतति को, मधुर बचन...
अपनी 20 साल पुरानी कविता – ‘उत्तराखंड की लोरी’ को नए सांचे में ढालने की एक गुस्ताख़ कोशिश -चुनाव परिणाम से पूर्व का मातृ-पुत्र संवाद –बेटे का प्रश्न -शपथ-ग्रहण के बाद बता मां ! क्या अच्छे दिन आएँगे?या पंजे की अनुकम्पा से, कष्ट सभी मिट जाएंगे?गठबंधन के नेता क्या, भार...
आदरणीय राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी की वाल से उधार ली गयी महात्मा बुद्ध और उनके शिष्य ‘पूर्ण’ की एक प्रेरक कथा –बुद्ध का शिष्य था - पूर्ण !बहुत दिनों तक उनके पास रहा, जब शिक्षा पूरी हो गयी तो बुद्ध ने कहा –‘शिष्य ! अब तुम मेरे प्रेम और अहिंसा के संदेश को हिंसक लोगों के...
सवाल-जवाब -गुरु जी - बच्चों ! 'सी. बी. आई.' का फ़ुल फॉर्म क्या होता है?एक मेधावी छात्र - गुरु जी ! पौने पांच साल पहले तक इसका फ़ुल फॉर्म -'कांग्रेस ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टीगेशन' थालेकिन फिर बदल कर -'सेंट्रल बीजेपी इन्वेस्टीगेशन' हो गया है.xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxच...