ब्लॉगसेतु

आदमी का कोई अब भरोसा नहींवह कहाँ तक गिरेगा ये सोचा नहीं’रामनामी’ भले ओढ़ कर घूमताकौन कहता है देगा वो धोखा नहींप्यार की रोशनी से वो महरूम हैखोलता अपना दर या दरीचा नहींउनके वादें है कुछ और उस्लूब कुछयह सियासी शगल है अनोखा नहींया तो सर दे झुका या तो सर ले कटाउनका फ़रमान...
एक ग़ज़ल : नहीं जानता हूँ कौन हूँ--नहीं जानता कौन हूँ ,मैं कहाँ हूँउन्हें ढूँढता मैं यहाँ से वहाँ हूँतुम्हारी ही तख़्लीक़ का आइना बनअदम से हूँ निकला वो नाम-ओ-निशाँ हूँबहुत कुछ था कहना ,नहीं कह सका थाउसी बेज़ुबानी का तर्ज़-ए-बयाँ हूँतुम्हीं ने बनाया , तुम्हीं ने मिटायाजो...
समझ के परेनागरिकता कानून को लेकर देश में जो बवाल खड़ा करने का प्रयास हो रहा है वह समझ के परे है.हो सकता है कि यह कानून संविधान का उल्लंघन करता हो,  पर इस बात का निर्णय तो उच्च न्यायालय ही कर सकता है. सडकों पर दंगे कर के तो यह बात तय नहीं हो सकती.हो सकता है कि प...
चन्द माहिया01रंगोली आँगन कीदेख रही राहेंछुप छुप कर साजन की02धोखा ही सही मानाअच्छा लगता हैतुम से धोखा खाना03औरों से रज़ामन्दीमहफ़िल में तेरीमेरी ही ज़ुबाँबन्दी04माटी से बनाते होक्या मिलता है जबमाटी में मिलाते हो ?05सच,वो न नज़र आताकोई है दिल मेंजो राह दिखा जाता-आनन्द.पा...
एक ग़ज़ल : झूठ इतना इस तरह ---झूठ इतना इस तरह  बोला  गयासच के सर इलजाम सब थोपा गयाझूठ वाले जश्न में डूबे  रहे -और सच के नाम पर रोया गयावह तुम्हारी साज़िशें थी या वफ़ाराज़ यह अबतक नहीं खोला गयाआइना क्यों देख कर घबरा गएआप ही का अक्स था जो छा गयाकैसे कह दूँ...
चन्द माहिया01कुछ याद तुम्हारी हैउस से ही दुनियाआबाद हमारी है02जब तक कि सँभल पाताराह-ए-उल्फ़त मेंठोकर हूँ नई खाता03लहराओं न यूँ आँचलदिल का भरोसा क्याहो जाए न फिर पागल04जीने का जरिया थासूख गया वो भीजो प्यार का दरिया था05गिरते न बिखरते हमकाश ! सफ़र में तुमचलते जो साथ सन...
नादां है बहुत कोई समझाये दिल को चाहता उड़ना आसमाँ में है पड़ी पांव ज़ंजीर कट चुके हैं पंख फिर भी उड़ने की आस.. नादां है बहुत कोई समझाये दिल को डगमगा रही नौका बीच भंवर फिर भी लहरों से जुझने को तैयार परवाह नहीं डूबने की मर मिटने को तैयार नहीं मानता दिल यह समझाने से...
मुझे याद आओगेकभी तो भूल पाऊँगा तुमको, मुश्क़िल तो है|लेकिन, मंज़िल अब वहीं है||पहले तुम्हारी एक झलक को, कायल रहता था|लेकिन अगर तुम अब मिले, तों भूलना मुश्किल होगा||@ऋषभ शुक्लाहिन्दी कविता मंच
एक ग़ज़ल : भले ज़िन्दगी से हज़ारों ---भले ज़िन्दगी से  हज़ारों शिकायतजो कुछ मिला है उसी की इनायतये हस्ती न होती ,तो होते  कहाँ सबफ़राइज़ , शराइत ,ये रस्म-ओ-रिवायतकहाँ तक मैं समझूँ ,कहाँ तक मैं मानूये वाइज़ की बातें  वो हर्फ़-ए-हिदायतन पंडित ,न मुल्ला ,न राजा ,...
हे हरसिंगारओ शेफालीअरी ओ प्राजक्ता !सुना हैतू सीधे स्वर्ग सेउतर आई थीकहते हैसत्यभामा की जलनदेवलोक सेपृथ्वी लोक परतुझे खींच लाई थीतू ही बताहै ये चन्द्र का प्रेमया सूर्य से विरक्तिकि बरस मेंफ़कत एक माससिर्फ रात कोदेह तेरीहरसिंगार के फूलों सेभरभराई थी !