ब्लॉगसेतु

 विधाता का अन्याय “किस बात को लेकर आप विचारमग्न हैं?” मैंने मुकन्दी लाल जी से पूछा. वह आये तो दे गपशप करने पर बैठते ही किसी चिंता में खो गये. “सोच रहा था, विधाता भी कुछ लोगों के साथ बहुत अन्याय करते हैं.” “अब किस के साथ अन्याय कर दिया हमारे विधाता ने?” “इन वि...
 चन्द माहिए     :1: सब ग़म के भँवर में हैं,कौन किसे पूछे?सब अपने सफ़र में हैं।   ;2: अपना ही भला देखा, कब देखी मैने, अपनी लक्षमन रेखा?    :3: माया की नगरी में, बाँधोंगे कब तक इस धूप को गठरी में ?    :4: होठों पे तरान...
 डायरी के पन्नों से-------।आज नवमी है -कल दशहरा है।कल आप लोग व्यस्त रहेंगे रावण पर पत्थर फेकने में---रावण का पुतला जलाने में । तो यह व्यंग्य आज ही पढ़ लें--पता नहीं कल समय मिले न मिले--[ आगामी व्यंग्य संग्रह - रोज़ तमाशा मेरे आगे---से]...
                लखिमपुर में घटी घटनाओं की अनकही कहानी लखिमपुर में जो हिंसा की घटना कुछ दिन पहले घटी उसको लेकर आप ने हर टीवी चैनल पर बहुत कुछ सुना होगा. पर शायद ही किसी मीडिया विश्लेषक ने आपको उस कारण के विषय में कुछ बताय...
 एक ग़ज़ल बगुलों की मछलियों से, साजिश में रफ़ाक़त है,कश्ती को डुबाने की, साहिल की  इशारत  है । वो हाथ मिलाता है, रिश्तों को जगा कर के,ख़ंज़र भी चुभाता है, यह कैसी शरारत है ? शीरी है ज़ुबां उसकी, क्या दिल में, ख़ुदा जाने ,हर बात में नुक़्ताचीं, उसकी तो ये...
  ----2-अक्टूबर- गाँधी जयन्ती----अँधियारों में सूरज एक खिलानेवालाजन गण के तन-मन में ज्योति जगानेवालागाँधी वह जो क्षमा दया करूणा की मूरतफूलों से चटटानों को चटकाने वालाक़लम कहाँ तक लिख पाए गाँधी की बातेंइधर अकेला दीप, उधर थी काली रातेंतोड़ दिया जंजीरों को जो यष्...
मेरी आंखों में तुम्हारेइंतज़ार के कुछघने जंगल उग आए हैये mangroves हैये आसुओं सेक्षारीय पानी में हीउगा करते हैकुछ व्यथा केबड़े बड़े पेड़ उग आए है इनमें..जिनकी जड़ेपैठ चुकी है,आंखो से होते हुए...मेरे तन और मन के बहन भीतर तक !!ये शिथिल औरस्थूल करने लगे हैमे...
 चन्द माहिए    :1: खुद तूने बनाया है. माया का पिंजरा, ख़ुद क़ैद में आया है।   :2: किस बात का है रोना? छोड़ ही जाना है फिर क्या पाना, खोना ?    :3: जब चाँद नहीं उतरा, खिड़की मे, तो फिर किसका चेहरा उभरा ?    :4: जब तुमने पुकार...
   क़िस्त 12   1 साथ दिया है तूने इतना मुझ पर रही इनायत तेरी तुझे नया हमराह मिला है फिर क्या रही ज़रूरत मेरी ।   2 रहने दे ’आनन’ तू अपना प्यार मुहब्बत जुमलेबाजी मेरे चाँदी के सिक्कों पर कब भारी तेरी लफ़्फ़ाज़ी ?   3 दिल पर चोट लगी है ऐसे ख़ामोशी...
 एक व्यंग्य : शायरी का सर्टिफ़िकेट चाय का एक घूँट जैसे ही मिश्रा जी के हलक के अन्दर गया कि एक शे’र बाहर निकला। चाय की प्याली नहीं है , ज़िन्दगी का स्वाद है, मेरे जैसे शायरों को आब-ओ-गिल है, खाद है ।[आब-ओ-गिल है खाद है = यानी खाद-पानी है ]मिश्रा जी ने अपनी स...