ब्लॉगसेतु

हिंदी में टोटकेबाज़ , खेमेबाज़ , ड्रामेबाज़ , दुकानदार और जाने क्या-क्या बहुतेरे हैं पर अरविंद कुमार जैसा तपस्वी ऋषि आज की तारीख में हिंदी में कोई दूसरा नहीं । पचासी साल की उम्र में आज भी वह हिंदी के लिए जी-जान लड़ाए पड़े हैं । रोज छ से आठ घंटे काम करते हैं ।&nbs...
 पोस्ट लेवल : लेख
कभी कभी अब भी तुम सपनों में झांक जाती हो तो लगता है जैसे कोई सिनेमा शुरू हो गया है। ऐसा सिनेमा जिस की कोई एक कहानी नहीं होती। टुकड़ों–टुकड़ों में बंटी कई सारी कहानियां। उन दिनों की कहानियां जब मैं तुम से प्यार करता था। इकरार और इसरार करता था। बेकरार तुम्ह...
 पोस्ट लेवल : कहानी
महुए सी महकती मीठी यादों में भी मिलती होतो बांहों में ही मिलती होयह क्या हैकभी तो अवकाश दोकि अपने आप से भी मिलूं तुम्हें याद हैजब एक सुबह महुए के बाग़ मेंहमने तुम ने मिल कर महुआ बिना था डलिया भर लेकिन उस महुए की एक माला गुंथी थी अकेले तुम नेउसी महुए के पेड़ के नी...
 पोस्ट लेवल : कविता
जब कोई बेशऊर औरत बदसुलूकी करती हैबेवज़ह अपमानित करती मिलती हैबदमिजाजी का अंधेरा फैलाने लगती है तो इस सब से बचने के लिए , इस से उबरने के लिए मैं पुरुष नहीं रह जाता , बच्चा बन जाता हूं इस लिए कि बच्चे बुरी बात बहुत जल्दी भूल जाते हैंबच्चे हर औरत में अपनी मां पाते ह...
 पोस्ट लेवल : कविता
तुम मिलती हो ऐसे जैसे नदी का जलऔर छू कर निकल जाती हो मुझे भी क्यों नहीं साथ बहा ले चलतीजैसे धरती में प्राण फूंकती होप्रकृति को रचती फिरती हो मुझ में भी कुछ रचो नप्रेम के मंत्र फूंक कर रचोइस तरह रचो कि जैसे घर घर का सुख रचती हो कि जैसे दुनियाऔर दुनिया को सुंद...
 पोस्ट लेवल : कविता
पेंटिंग : अवधेश मिश्र जीवन के मोड़ का यह भी अजब मंज़र पेश हैकि बेटी मां बन जाती है , और मां नन्ही-मुन्नी बच्ची बेटी मां की तरह ज़िम्मेदारियां निभाने लगती हैबात-बात में संभालने , समझाने और दुलराने लगती है और मां नन्ही बच्ची की तरह ज़िद करने लगती हैबात-बात...
 पोस्ट लेवल : कविता
कुछ समय पहले मैं राजस्थान गया था।  इस बार बेटा गया । यानी पधारो म्हारो देश ! फिर-फिर ! मैं लौटा था तो यादों और अनुभव की दास्तान ले कर । बेटा  मुझ से ज़्यादा , बहुत ज़्यादा ले कर लौटा है । मैं एक सेमिनार के सिलसिले में गया था । बेटा कॉलेज टूर के बहाने घूमन...
 पोस्ट लेवल : टिप्पणी
कुछ फेसबुकिया नोट्स इतने सारे पुस्तक मेले लगते हैं । किसिम-किसिम के मेले । तो पुस्तक बिकती भी ज़रूर होगी। तो यह प्रकाशक लेखक को रायल्टी भी क्यों नहीं देते ? और कि रायल्टी देने के बजाय उलटे लेखक से ही किताब छापने के पैसे क्यों मांग लेते हैं । अभी एक मशहूर कवि...
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 प्रताप दीक्षित                                                                  हिंदी स...
 पोस्ट लेवल : समीक्षा
 कुछ  फेसबुकिया नोट्स  अरविंद केजरीवाल किरन बेदी को तो पानी पिला देंगे पर नरेंद्र मोदी का तो वह नाखून भी नहीं छू पा रहे। न राजनीतिक पैतरेबाज़ी में , न विजन में , न नौटंकी में , न वादे और इरादे में, न प्रहार और प्लैनिंग में । अरविंद केजरीवाल को...
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