ब्लॉगसेतु

मैं दिल्ली की एक आम लड़की हूं। सड़कों पर, बसों में, मेट्रो में और दफ़्तरों में नज़र आने वाली एक आम लड़की... जो हर उस पल घुटती है, जब किसी की बेशर्म नज़रें उसे घूरती हैं। वही आम लड़की जो तब-तब शर्मिंदा होती है, जब-जब उसे बेइज्जत करने वाले ढिठाई से हंसते हैं। मेरी को...
शब्द..कहां हैं आज !!जिन्हें कागज़ पर उकेरकरमन हल्का होता.शब्द...जो बनते आवाज़कभी ख़्याल...तो कभीडायरी में छिपी याद.शब्द हीबनाते थे रिश्ताअब बन गए हैं...अजनबीहां... वही शब्दजाने कहां हुए गुम !!!क्यों हुए गुमसुमअब ढूंढू कहां ?न यहां, न वहांमेरी ही... तरहखामोश हुए सबव...
मैं तुम्हें नहीं जानती... जो तुम्हारे साथ बीता वो भी नहीं जानती.. कुछ सुना है और कुछ पढ़ा है तुम्हारे बारे में.. तुम्हारे दर्द को फिर भी मैं नहीं समझ पाई.. आज फिर तुम्हारे बारे में कुछ सुना.. तो दिमाग में एक ही बात कौंधी.. वो ये कि.. तुम जीत जाना। इस बार जीत तुम्हा...
फिर भीमुझे यकीन नहींबाहं छुड़ाकर,तुम लौट तो गएठहरे नहीं,ना पुकारा मुझेदर्द छोड़कर,तुम लौट ही गएफिर भीमुझे यकीन नहींक्या तुम ही थेवोकभी मिले थेकहींसब भूलकर,तुम लौट तो गएमुझे यकीन नहींबसइतना ही सफरयाना मंजिल ना डगर,बीच राह छोड़करतुम चले तो गएफिर भीमुझे यकीन नहींखामोश...
फिर वही उथल-पुथल,विचारों के सागर में..फिर वही हलचलस्वयं पर प्रश्नचिह्न,स्वयं ही देती उत्तर..फिर वही हलचलहां.. बहकते हैं कभीमेरे भी विचार,तब जूझती हूं मैं भी..अपने ही अंतरद्वंद से,हूक उठाती है मन में..फिर वही हलचलस्वयं में उलझी रहूं..या प्रश्नों को सुलझाऊं,क्यों नही...
हा हा हा हा हा.. ही ही ही ही.. अरे भई हैरान मत होइए. मैं हंस रही हूं. वैसे इस तरह नहीं हंसती. ये तो बस आपको जताने के लिए. खैर, अब हंसने की वजह भी बता दूं, आप जानना तो चाहते हैं ना. प्लीज इनकार मत करिए. शायद आपको भी हंसी आ जाए. और कुछ नहीं खून की कुछ बूंद बढ़ जाएंगी...
गोली की आवाज नहीं..ना कोई धमाका है।तुम्हारे शहर को देखातब सोचा.. मेरे शहर में कितना सन्नाटा है।जाने कैसे जीते हैं..तुम्हारे शहर के लोग,एक के बाद एकधमाका खुद को दोहराता है।ये मेरी शिकायत नहीं,ना कोई गिला मुझे..अपने दायरे में खुश हूं मैं,लेकिन..तुम कैसे जीते होगे..बस...
एक साल बीता.. जैसे बीता कोई पड़ाव.. लेकिन अब तक नहीं बदले हालात.. आज भी खिलवाड़.. कभी धमाका.. कभी हत्या.. नहीं लिया कोई सबक.. 26/11 का एक साल.. शहीद हुए कई जाबांज.. बचा लिया देश.. दे दी आहुति प्राणों की.. क्या हमने कुछ सीखा.. क्या हम बदले.. नहीं.. नहीं और सिर्फ नही...
जब ना रहे साथ,औरखत्म हो हर बातकह देना चांद से..उसकी चांदनी हमने देखी नहींकह देना बाग से..उसमेंफूल हमारा खिला नहीं..जब घिर आए रात,औरबिगड़े हों हालातकह देना रास्तों से..उनसे हम गुजरे नहींकह देना साज से..उसमेंहमारी आवाज नहींजब मर जाए जज़्बातऔर जिंदगी लगे आघातकह देना च...
तमाशे के दो पाटों के बीच पिसती जिंदगी.. चेहरे पर शिकन.. हाशिए पर सिमटी खुशियां.. कुछ यही कहानी हो गई तमाम कलाकारों की। अब यहां हमेशा अफवाहों का बाजार गर्म रहता। साहबजी और मुनीमजी की खींचातनी से सभी वाकिफ थे.. लेकिन फिर भी कभी ऐसा लगता कि.. सब कुछ ठीक ही चल रहा है।...