ब्लॉगसेतु

कुछ लोग नमस्कार करने में पीर होते हैं और कुछ नमस्कार करवाने में. नमस्कार करने वाले पीर, चाहे आपको जाने या न जाने, नमस्ते जरुर करेंगे. कुछ हाथ जोड़ कर और कुछ सर झुका कर, शायद उनको मन ही मन यह शान्ति प्राप्त होती होगी कि अगले को नमस्ते किया है और उसने जबाब भी दिया है...
प्रभु अपने भक्तों का उद्धार करने भारत भूमि पर अपनी नाम पताका लहरा रहे हैं. लगता है अच्छे दिन आने वाले हैं. प्रभु का इस तरह अवतरित होना कोई संप्रदायिकता वाली बात  नहीं है और न ही इसे हिंदुत्व से जोड़कर देखना चाहिये.हर बात जिसमें अच्छे दिन नजर आयें, वो संप्रदायिक...
दो काल खण्डइस जीवन केऔर उन्हें जोड़तावो इक लम्हाजो हाथ पसारे लेटा है इस तरह दोनों को समेटतामानिंद जिल्द होमेरी जिन्दगी कीकिताब का!!-समीर लाल ’समीर’
वो टैटू पसंद लड़कीचिपका लातीदायें गाल पर तिरंगाऔरबायें गाल पर चाँद सितारा हरियालीवो करवट बदलतीकि बदल जाती जमाने की नजर!!सहम जातीवो टैटू पसंद लड़की!!-समीर लाल ’समीर’
एकाएक सन २००५ के आस पास हिन्दी में ब्लॉग लिखने वाले अवतरित हुए.. और फिर तो सिलसिला चल पड़ा..रचनाओं के रचित होने का...लोगों को प्रोत्साहित करने का लिखने के लिए..आप भी लिखो. बोल लेते हो तो लिख भी लोगे. जैसे फिल्म देख कर घर लौटने पर फिल्म की कहानी सुनाते हो न..वैसे ही...
सुन कर अजीब सा लग सकता है मगर हर शहर के मुँह में एक जुबान होती है और उस जुबान की अपनी एक अलग ही जुबान होती है. आपका शहर दरअसल वो शहर होता है जो आपके बचपन से जवानी तक के सफर का और अक्सर उसके बाद तक का भी, चश्मदीद गवाह होता है या यूँ कहें कि वो शहर जिस शहर में, आप...
साहेब की थाली में दो सूखी रोटी और पालक का साग उनके स्वास्थय के प्रति सजगता दिखाती है. वो बड़े गौरव के साथ अपना ५६ इंची सीना ताने अपने रईस दोस्तों के बीच अपनी डाइट बताते है. अपना एक्सर्साईज रुटीन बधारते हैं. नित प्रति दिन ऐसी साइकिल (एक्सर्साईज बाईक) चलाने का दावा कर...
बहुत सूक्ष्म अध्ययन एवं शोध के बाद लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि यदि आपके नाम के अन्त में आ की मात्रा लगाने के बाद भी नाम आप ही का बोध कराये तो आप अन्तरराष्ट्रीय स्तर के हो सकते हैं. जैसे उदाहरण के तौर पर लेखक का नाम समीर है. यदि आपको समीर नाम सुनाई या दिखाई पड़...
मंच प्रस्तुति- नगर की एक नौटंकी मे... चक्रवर्ती सम्राट अशोक!! परदा गिरा और सम्राट अशोक भागा चेंज रुम की तरफ.. कपड़े बदले और लग गया लाईन में.. आज का मेहताना मिले तो खरीदे बीमार बीबी की दवा और बच्ची के लिए ..क्या? सोचा और सर झटकार दिया.. न! उतना सारा पैसा थोड़...
नजर की पहचान थी उससे यही कोई तीन चार बरसों की. सिर्फ दफ्तर आते जाते हुए ट्रेन में पड़ोस के डिब्बे में उसे चढ़ते उतरते देखता था और नजर मिल जाती थी. लबों के हाथ कभी इतने नहीं बढ़े कि कोई मुस्कराहट उस तक पहुँचा दें और उसके लबों के तो मानो हाथ थे ही नहीं. भाव विहीन चेहरा....