ब्लॉगसेतु

"आज कुछ special बना दो, Sunday है... "... अभी तो परसों कढ़ाही पनीर बनी थी... "सुनो, मैं अपने दोस्तों से मिल कर आ रहा हूँ, वो आज Sunday है न..."... हाँ, दोस्त कौन, सब Office वाले ही तो हैं... जैसे बाकी दिन तो उनका मुँह भी देखने नहीं मिलता..."Please, आज shopping...
मैं अपने घर में ही अजनबी हो गया हूँ आकरमुझे यहाँ देखकर, मेरी रूह  डर गयी हैसहम के आरज़ुएँ कोनों में जा छुपी हैंलवें बुझा दी हैं अपनी चेहरों की हसरतों नेमुरादें दहलीज़ ही सर रखके मर गयी हैंमैं किस वतन की तलाश में यूं चला था सेकि अपने घर में भी अजनबी हो गया हूँ आक...
कल मुख्यमंत्री और कल वनमंत्री...अरे नहीं नहीं, ये किसी राजनीतिक दंगल की बात नहीं हो रही और न ही मैं किसी उलटफेर की खबर आप तक पहुंचा रही हूँ... ये तो बस हम "सरकारी बच्चों" का दर्द है जो आज बयाँ कर रही हूँ... सरकारी बच्चों" से मेरा क्या तात्पर्य है ये तो आप सब समझ ही...
धो-पोंछ के रख दी थी न हर बात???उलझी-बिखरी,खट्टी-मीठी,इधर-उधर की... हर यादहर हंसी, हर मज़ाक,हर अठखेली,हर फ़रियाद,हर अहसास,हर जज़्बात...फिर क्यों, यूं अचानक???वापस आ रहे हैं वो पल...और क्यों सता आ रहीं हैंउन पलों की वो सीली-सीली यादें...
दिवाली आई... छुट्टियाँ लिए, सब अपने घरों की और चलते हुए... कई रंगों के साथ, रंगोली के साथ... दीयों की जगमगाहट, designer candles की रौशनी के साथ... घर की साफ़-सफाई और सजावट में माता लक्ष्मी के आगमन के साथ, पूजा-पाठ और प्रसाद के साथ, पटाखों की गूँज के साथ... और न जाने...
आइये आइये आइये...आज फिर यहीं...कुछ अलग{शायद}...कुछ नया{शायद}...खैर... हाँ जी तो ये विचार आया, जोशी डेनियल {JD} के फोटोस देखने के बाद... और यहाँ तो बस हमेशा कुछ-न-कुछ करने में दिमाग घूमता ही रहता है... सो, मैंने ये बात JD से पूछी की क्या हम ऐसा कर सकते हैं, जहाँ फोट...
आज न तो कोई कविता न ही कोई लेख...बल्कि एक गुज़ारिश... एक नया पत्ता खेला है... नया हाँथ आज़माया है...आपमें से कुछ को परेशान कर चुकी हूँकुछ को परेशान करना बाकी था..कुछ को सुना दियाकुछ के कान खाना बाकी था...क्या है न, आज तक सिर्फ दिमाग खाती आयी हूँ सबका...और बताया...
बड़े हमें नहीं समझते, हम छोटों को नहीं समझते...कोई हमें नहीं समझता, हम किसी और को नहीं समझते...बड़ी आम बातें हैं, बड़ी आम शिकायतें हैं...अखिय ये बातें, ये शिकायतें क्यों है???  बड़े  हमें क्यों नहीं समझते? क्यों वो हमेशा हमें गलत ही समझते हैं? क्यों उन्हें...
आज, 14 सितम्बर... हिंदी दिवस... हर तरफ सिर्फ हिंदी-हिंदी चिल्लाते लोग... इस भाषा का उपयोग करने के लिए ज़ोर-शोर से लगे हैं... बहुत अच्छा लगता है ये सब देखकर... सच है हम हिन्दुस्तानी कहलाए जाते हैं, और हिंदी हमारी भाषा है, उसका सम्मान करना चाहिए, उसका उपयोग करना चाह...
यूँ ही एक बात कही थी तुमने कलबातों ही बातों में...कुछ दबे भाव थेउनमें... जो शब्द सीचें थे लेकर हाँथ मेरा अपने हाथों में...न जाने क्या था उन छिपी छिपी सी बातों मेंबहुत था फर्क बड़ा... लफ़्ज़ों और ज़ज्बातों मेंपर कुछ तो थाजो कहना चाहते थे तुम...या चाहते थे समझाना मुझे....