ब्लॉगसेतु

चल पड़े होतो कट ही जाएगाधीरे-धीरे दुरूह सफ़र,विचलित है हृदयदेखकर21 दिवसीय लॉक डाउन के बादघर की ओर जातेपैदल ग़रीबों की ख़बर। कमाल की हिम्मत हैहालात औरकोरोना वायरस से लड़ने की,तुम्हें कौन समझाएनियम-क़ानून, जुगतमहामारी से लड़ने की। तुम हो भारत कीतथाकथित शान,सरकार क...
बसंत बहार का यौवन थेअनुपम अद्भुत श्रृंगार थे  ये पीतवर्ण सूखे फूल-पत्ते,पर्णविहीन टहनियों पर लटके रह गये हैं अब मधुमय मधुमक्खी के छत्ते।  अब पेड़ों के नीचे बिस्तर से बिछ गये हैंवृक्ष के अलंकरण,इनमें समाया है दर्द, आह-मिलन के ए...
 पोस्ट लेवल : कविता पतझड़
एकाकीपन क्लांत मन को एकांत में जाने को कहता कोरोना वायरस महामारी को हतोत्साह के साथ संसार सहता। तमस का अंबार है छाया वक़्त विकट महामारी लाया5000 लोग काल-कवलित हुए लाख से ऊपर संक्रमित हुए। दुनिया में देश जुट गये हैं अपने-अपने न...
 पोस्ट लेवल : कोरोना वायरस कविता
फ़रवरी 2020 अंतिम सप्ताह दिल्ली में दंगा चीख़-पुकार आह ही आह!गिरीं लाशेंलुटे-जले मकान-दुकानपीड़ितों का पलायन लाशों के सौदागरों के बयान एंकर-एंकरनियों की तलवार / म्यान क्षत-विक्षत लाशों के ढेर घायलों की दारुण टेर विधवाओं का विकट विलाप यतीमों का दिल दहलाता आलाप माँओं की...
तान वितान जबनागफनी ने घेरा पूरा खेत, मरुभूमि ने दिली सत्कार किया विहँसी भूरी रेत।  इतरायी नागफनी ख़ुद पर जब बंध्या-धरती का सलोना शृंगार हुई,सूख गयी जब हरियाली चहुओर अकाल में पशुओं का जीवनरक्षक आहार हुई। &n...
 पोस्ट लेवल : कविता नागफनी
 1. जलती बस्ती~ खड़ा है लावारिस संतरा-ठेला। 2. शहरी दंगा~ एक सौ पचास है दूध का भाव। 3. संध्या की लाली~क्षत-विक्षत लाश चौपाल पर। 4. अर्द्ध-यामिनी~ जलते घरोंदों में इंसानी शव। 5. भोर...
दीवार उठती है बाँटती है आचार-विचार रहन-सहन दशा-दिशा कोई सेंध लगाकर देख लेता है आरपार दीवार ढोती है व्यक्ति की निजताअस्थायी सुरक्षा का पता  संकीर्णता के कीड़े-मकोड़े सहती है महत्त्वाकाँक्षा के हथौड़ेप्रकृति सिहर उठ...
 पोस्ट लेवल : कविता असीम वेदना
1.गृह-वाटिका~बाला भरे टोकरी  हिना-पत्तियाँ।2.संध्या की लाली~मेहंदी रचे हाथमींचे अखियाँ।3.सावन-सांझ~शिला पर पीसतीहिना बालिका।4.सावन-भोर ~हिना से चाँद-फूलरची हथेली।5.बसंत-सांझ~मेहंदी से लिखतीपिया का नाम।6.पूस की रात~कँबल से बाहरमेहंदी-हाथ।7.शरद-सांझ~ताके पिया हथ...
 पोस्ट लेवल : हाइकु
भुरभुरी भूमि पर उगे किरदार-से कँटीले कैक्टसनिर्जन परिवेश पर उकताकर कुंठित नहीं होतेये भी सजा लेते हैं अपने तन पर काँटों संग फूल   सुदूर पर्वतांचल में एक मोहक महक से महकती स्वागतातुर वादी  रंग-विरंगे सुकोमल सुमन...
बसंत तुम आ तो गये हो? लेकिन कहाँ है...तुम्हारी सौम्य सुकुमारता ?आओ!देखो!कैसे कोमल मन है हारता।खेत, नदी, झरने, बर्फ़ीली पर्वत-मालाओं में फ़स्ल-ए-गुल के अनुपम नज़ारे, बुलबुल, कोयल, मयूर, टिटहरी टीसभरे बोलों से बसंतोत्सव को पुकारे।&nbsp...