ब्लॉगसेतु

सिंधु तट पर एक सिंदूरी शाम गुज़र रही थीथी बड़ी सुहावनी  लगता था भानु डूब जाएगा अकूत जलराशि में चलते-चलते बालू पर पसरने का मन हुआ भुरभुरी बालू पर दाहिने हाथ की तर्जनी से एक नाम लिखा सिंधु की दहाडतीं...
पृथ्वी की उथल-पुथल उलट-पलटकंपन-अँगड़ाई  परिवर्तन की चेष्टा कुछ बिखेरा कुछ समेटाभूकंप ज्वालामुखी बाढ़ वज्रपात सब झेलती है सहनशीलता से धधकती धरतीजीवन मूल्यों की फफकती फ़सल देख रहा है आकाश मरती &n...
जेलों में  जिस्म तो क़ैद रहे  मगर जज़्बात  आज़ाद रहे महामूर्खों के  दिमाग़ की उपज  बेवक़ूफ़ कीड़े-मकौड़े  खाए जा रहे काँटों के बीच मनोमालिन्य से परे आशावान अंतरात्मा के पलते मीठे बेर   चीख़-चीख़करअपने पकने की म...
 जीवन के रीते तिरेपन बसंतमेरे बीते तिरेपन बसंत  बसंत की प्रतीक्षा का हो न कभी अंतप्रकृति की सुकुमारता का क्रम-अनुक्रम  चलता रहे अनवरत अनंत नई पीढ़ी से पूछो-कब आया बसंत? कब गया बसंत...? &...
समाचार आया है-"इंदौर में बेघर बुज़ुर्गों को नगर निगम के ट्रक में भरकर शहर से बाहर..."महादेवी वर्मा जी कहानी 'घीसा' स्मृति में घूम गई जब इंदौर का यह समाचार पढ़ा  संवेदना ने खींचकर गाल पर तमाचा जड़ामहादेवी जी नदी पार करके ग़रीब ग्रामीण बच्चों को पढ़ाने...
धुंध में धूमिल हैं दिशाएँसीखे-पढ़े को क्या सिखाएँविकराल विध्वंस की सामर्थ्य समाई उँगलियों मेंसघन कुहाँसे से फिर-फिर लड़ा जाएगा रवि रोपता जा रहा है विचार अपनी उज्जवल रश्मियों में भीड़ के जयकारे उत्साह उमंग नहीं व्यस्त हैं भय उगलने मेंरौंद...
उस शहर के पश्चिमी छोर पर  एक पहाड़ को काटकर रेल पटरी निकाली गई नाम नैरो-गेज़ धुआँ छोड़ती छुकछुक करती रूकती-चलती छोटी रेल सस्ते में सफ़र कराती अविकसित इलाक़ों में जाती तीस साल उपरांत पुनः जाना हुआ न पटरी थी न पह...
 देख रहा है सारा आलम खेतों में सरसों फूली हैवो देखो ओस से भीगे शजर की शाख़ पर नन्ही चिड़िया झूली है न परेड की चिंता न समिति की फ़िक्रअसहमत हो गई सत्ता से आज गाजर-मूली है भरोसा खोकर ढोते रहो ख़ुद को कंधों पर लज्जाहीन समझ अब देर तक राह भूली है। © रवीन...
ऐ धूप के तलबगार तुम्हारी गली तो छाँव की दीवानी हैकम-ओ-बेश यही हर शहर की कहानी हैधूप के बदलते तेवर ऐसे हुए ज्यों तूफ़ान में साहिल की उम्मीद  धूप की ख़्वाहिश में अँधेरी गलियाँ कब हुईं ना-उम्मीदधूप के रोड़े हुए शहर में सरसब्ज़ शजर के साथ बहुम...
 तुच्छताओं को स्थाई स्थान ढूँढ़ना था तो राजनीति में समा गईंहताशाओं को तलाश थी मुकम्मल ठिकाने की तो कापुरुष में समा गईंचतुराई चपला-सी चंचल भविष्य बनाने निकली तो बाज़ारों की रौनक में बस गई जीने की चाह भटकती रही सन्नाटों...