ब्लॉगसेतु

दिल में आजकल एहसासात का  बे-क़ाबू तूफ़ान आ पसरा है, शायद उसे ख़बर है कि आजकल वहाँ आपका बसेरा है।ज़िन्दगी में यदाकदा ऐसे भी मक़ाम आते हैं, कोई अपने ही घर में अंजान  बनकर सितम का नाम पाते हैं।कोई किसी को&nbs...
यह सड़ाँध मारतीआब-ओ-हवा भले हीदम घोंटने परउतारू है,पर अब करें भीतो क्या करेंयही तोहमसफ़र हैदुधारू है।मिट्टीपानीहवावनस्पति सेसदियों पुरानीतासीर चाहते हो,रात के लकदकउजालों मेंटिमटिमातेजुगनुओं कोपास बुलाकरकभी पूछा-"क्या चाहते हो?" तल्ख़ियों सेभागते-भागतेआख़िरहास...
तिमिर भय नेबढ़ाया हैउजास से लगाव,ज्ञानज्योति नेचेतना से जोड़ातमस कास्वरूपबोध और चाव।घुप्प अँधकार मेंअमुक-अमुक वस्तुएँपहचानने का हुनर,पहाड़-पर्वतकुआँ-खाईनदी-नालेअँधेरे में होते किधर?कैसी साध्य-असाध्यधारणा है अँधेरा,अहम अनिवार्यता भी हैसृष्टि में अँधेरा।कृष्णपक्ष कीविकट...
मिटकर मेहंदी को रचते सबने देखा है,उजड़कर मोहब्बत कोरंग लाते देखा है?चमन में बहारों काबस वक़्त थोड़ा है,ख़िज़ाँ ने फिर अपनारुख़ क्यों मोड़ा है?ज़माने के सितम सेन छूटता दामन है,जुदाई से बड़ाभला कोई इम्तिहान है?मज़बूरी के दायरों मेंहसरतें दिन-रात पलीं,मचलती उम्मीदेंकब क़दम...
रावण का विस्तृत इतिहास ख़ूब पढ़ा, तीर चलाये मनभर प्रतीकात्मक प्रत्यंचा पर चढ़ा।  बुराई पर अच्छाई की लक्षित / अलक्षित विजय का, अभियान दो क़दम भी आगे न बढ़ा!वक़्त की माँग पर ठिठककर आत्मावलोकन किया, तो पाया पुरातन परतों में ...
वोप्यारासपूतअब कहाँभगत सिंहइंक़लाब खोयासो गयी क्यों है क्रांति ?तोअबस्मरणबलिदानीभगत सिंहअलंकरण हैशहीद-ए-आज़म.रवीन्द्र सिंह यादव
 पोस्ट लेवल : वर्ण पिरामिड
ये ऊँची मीनारें  इमारतें बहुमंज़िला रहते इंसान ज़मीर से मुब्तला। वो बाढ़ क़हर न झोपड़ी न रही रोटी राहत फंड से कौन करेगा मौज़। © रवीन्द्र सिंह यादव
अंगारे आँगन में सुलग-दहक रहे हैं, पानी लेने परदेश जाने की नौबत क्यों ?न्यायपूर्ण सर्वग्राही राम राज्य में नारी को इंसाफ़ के लिये दर-ब-दर भटकना क्यों?बाढ़ में सब बह गया फ़सलें हुईं तबाह विदेशों में जलसों की बेहूदा ख़बरें क्यो...
हाँ मैं चंबल नदी हूँ !ऊबड़-खाबड़ बीहड़ों मेंबहती हुई नाज़ से पली हूँ.रोना नहीं रोया हैअब तक मैंनेअपने प्रदूषित होने का, जैसा कि संताप झेल रही हैंहिमालयी नदियाँ दोगंगा-यमुना होने का.उद्गम महू-इंदौर सेयमुना में संगम भरेह-इटावा तकबहती हूँ कल-कल स्वयंवीरा,मुझमें समाया दर्द...
उस दिन वह शाम काले साये में लिपटती हुई रौशनी से छिटकती हुई तमस का लबादा लपेटे जम्हाइयाँ लेती नज़र आयी थी तभी गुलशन से अपने बसेरे को लौटती नवयुवा तितलीउत्साही दुस्साहस की सैर  की राह पर चल पड़ीराह भटकी तो भूखे वीरान खे...