ब्लॉगसेतु

१९वें अखिल भारतीय सम्मान  "२०१९ हिंदी साहित्य दिव्य शिक्षारत्न सम्मान" अत्यंत हर्ष के साथ आप सभी गणमान्य पाठकों एवं लेखकों को सूचित कर रहा हूँ कि मुझे, मेरी प्रथम पुस्तक ''चीख़ती आवाज़ें" हेतु सरिता लोकसेवा संस्थान' उत्तर प्रदेश द्वारा, १९वें अखिल...
उठा-पटक  खेल रहे थे राम-राज्य का गली-गली हम खेल,आओ-आओ, मिलकर खेलें पकड़ नब्ज़ की रेल। मौसी तू तो कानी कुतिया खाना चाहे भेल मौसा डाली लटक रहे हैं,उचक-उचक कर ठेल। मौसी कहती, जुगत लगा रे कैसे पसरे खेल !धमा-चौकड़ी बुआ मचाती&nbs...
धारावाहिक...........( उपन्यास ) खण्ड -१अपने सम्मानित पाठकों के लम्बे इंतज़ार और माँग को देखते हुए, मैं अपने नये उपन्यास "धारावाहिक" को कई चरणों में आप सभी के समक्ष प्रस्तुत करने जा रहा हूँ। पाठकों की रुचि के आधार पर मैं इसे थोबड़े की क़िताब पर निरंतर अंतराल पर आगे बढ़ा...
गरिमा ...  मूल रचनाकार : ध्रुव सिंह 'एकलव्य'                                                           &n...
बोल दूँ ! हिम्मत नहीं गृहस्वामिनी !खाने-पीने वालों का दौर है..., अब दौर साहेब !भूखे-नंगों की गुहारें, अब सुनता है कौन... !वे 'रेस्तरां' में बैठकर , लिखते हैं ''सोज़े वतन''नरकट की स्याही से, अब दर्द चुनता, है वो कौन.... !  लिखना भी क्या मेरा था ! लिखते थे क...
आवश्यक सूचना :सभी गणमान्य पाठकों एवं रचनाकारों को सूचित करते हुए हमें अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है कि अक्षय गौरव ई -पत्रिका जनवरी -मार्च अंक का प्रकाशन हो चुका है। कृपया पत्रिका को डाउनलोड करने हेतु नीचे दिए गए लिंक पर जायें और अधिक से अधिक पाठकों तक...
आप सभी गणमान्य पाठकों एवं मित्रों को सूचित करते हुए मुझे अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है कि इस वर्ष अक्षय गौरव पत्रिका के RISING AUTHOR AWARD 2019 का ख़िताब मुझे दिया गया है। आप सबके सहयोग हेतु धन्यवाद ! सादर 'एकलव्य' 
लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 108 से 110 // ध्रुव सिंह 'एकलव्य' | रचनाकार: हिंदी साहित्य की ऑनलाइन पत्रिका hindi literature online magazineलघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन २०१९ में मेरी तीन लघुकथाएं :१. मटमैला पानी, २. ''ग...
नये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ...बीत गईं, अब साँझ नईलेकर आई है राग वहीबन नवल रात्रि में स्वप्न नयेकल नया सवेरा लाता हूँ।नये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ...वर्षों बीते,सदियाँ बीतींगंदले इतिहास के पन्नों मेंकुछ जीर्ण-शीर्ण, कुछ हरे-भरेउन जख़्मों को...
हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...स्नेह नया,वह साँझ नईउर आह्लादित उम्मीदों कोकर बाँधा था उसके कर सेमन विलग रहा, पर-सा मन कोहम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...तैरा करते थे स्वप्न बहुतकुछ मेरे लिए ,थोड़ा उनकोजीवन चलता,चरखा-चरखाडोरी कच्...