ब्लॉगसेतु

उड़ जा रे ! मन दूर कहीं जहाँ न हों,धर्म की बेड़ियाँ स्वास्तिक धर्म ही मानव कड़ियाँ बना बसेरा ! रैन वहीं उड़ जा रे ! मन दूर कहीं ...  श्वास भरे ! निर्मल समीर से विद्वेष रहित हो,द्वेष विहीन शुद्ध करे जो आत्मचरित्र बस तूँ जाकर...
शांत वेदना,अकलुषित मन हो,मिलकर प्रियतम रात सजल हो.........स्वप्नचंद्रिका मिलने आईप्रियवर तुमसे प्रीत लगाईनिशा पहर अब बीते दुख-साग्रीष्म ऋतु बरसात बुलाईस्मरण करूँ क्षण,नेत्र ही नम हो।शांत वेदना,अकलुषित मन हो,मिलकर प्रियतम रात सजल हो.........गए पिया परदेस कमाईएक युग...
चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   निशाकलश छल-छल छलके जब बन चकोर तू गाता है।  चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........    भोर जा रही परदेस पिया रथ-रश्मि चढ़ तू आता है&nb...
आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे...................     थी धवल केश-सी चिरपरिचित बन भूत-सी मिटती स्याही की बनकर आई है,साँझ वही कुछ ख़्वाब नवल थे..........   आँखों में पाले अबतक,...
साहित्य ही है 'धर्म' !जब उसने कहा था तंज की गहराइयों में जा फँसा था। लेखनी चम-चम बनी थीप्रगति द्योत्तक !जा रे ! जा ! बहरूपिये झुठला रहा था। बुद्धिजीवी साहित्य के थे वे पुलिंदे,कोने-कोने में छुपा भय खा रहा था। रे फिरंगी ! प्रत...
लालसा उस बौंर की अमिया की डाली पर पल्लवित-पुष्पित होती। नाहक था इंतजार छोटी-छोटी अमिया !लू चलतीहवाओं के थपेड़े में नंग-धडंग, पेड़ की छाँव में बैठे हम। गमछे की पोटली से निकालता 'रमुआ'नमक,मिर्च की पुड़िया,छील रहा था 'काका'अमिया को,ताला...
मन श्याम रंग विचार में तज, भूलत है सबको  अभी कुछ नींद में सपनें सजत ,चित्त रोअत है अभीभूत बन। धरे हाँथ सुंदर बाँसुरी ,कसे केश अपने मयूर पंख जग कहत जिनको त्रिकालदर्शन,हो प्रतीत ह्रदय निकट। मन श्याम रंग विचार में तज, भूलत है सबको  अभी&nb...
                                                   बाज़ारू हूँ ! कहके.... बंध के बजती पैरों में मैं चाहे सुबह हो शाम&nbsp...
                             ख़त्म करो !हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है। दिल्ली की उन सड़कों पर अपना कलुषित मन बेचा है। हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है।....... गुड़-गुड़ करते इस उ...