ब्लॉगसेतु

"सती की तरह" मैं आज भी हूँ सज रही सती की तरह ही मूक सी मुख हैं बंधे मेरे समाज की वर्जनाओं से खंडित कर रहें तर्क मेरे वैज्ञानिकी सोच रखने वाले अद्यतन सत्य ! भूत की वे ज्योत रखने वाले कभी -कभी हमें शब्दों से...
"और वे जी उठे" !मैं 'निराला' नहीं प्रतिबिम्ब ज़रूर हूँ 'दुष्यंत' की लेखनी का गुरूर ज़रूर हूँ 'मुंशी' जी गायेंगे मेरे शब्दों में कुछ दर्द सुनायेंगे सवा शेर गेहूँ के एक बार मरूँगा पुनः साहूकार के खातों में भूखा नाचूँगा नंगे&...
''वही पेड़ बिना पत्तों के''वही पेड़बिना पत्तों के झुरमुट सेझाँकता मन को मेरे भाँपताकल नहीं सोया था एक निद्रा शीतल भरी उनके स्मरणों को संजोता हुआशुष्क हो चलें हैं जीवन के विचार पत्ते तो लगे हैं सूखी डालियों पे झड़...
उस मील के पत्थर को सोचता चला जाता हूँ इस उम्र की दहलीज़ पर आकर फ़िसल जाता हूँ बस लिखता चला जाता हूँ ..... बस्ती हुई थी रौशन जब गुज़रे थे, इन गलियों से होकर कितना बेग़ैरत था, मैं अपनी ही खुदगर्ज़ी में   सोचकर आज़&nbsp...
कुछ जलाये गए ,कुछ बुझाये गएकुछ काटे गए ,कुछ दफ़नाये गएमुझको मुक़्क़म्मल जमीं न मिलीमेरे अधूरे से नाम मिटाए गए एक वक़्त था ! मेरा नाम शुमार हुआ करता था चंद घड़ी के लिये ही सही ,  ख़ास -ओ -आम हुआ करता था रातों -दिन महफ़ील जमती थी ,मेरे महलों की चौखट परचा...
बदलते समाज में रिश्तों का मूल्य गिरता चला जा रहा है। बूढ़े माता-पिता बच्चों को बोझ  प्रतीत होने लगे हैं और हो भी क्यूँ न ? उनके किसी काम के जो नहीं रह गए ! हास् होती सम्बन्धों में संवेदनायें ,धन्यवाद।           &nbsp...
अंगुलियाँ समेट के तू , मुट्ठियाँ बना ज़रा -ज़राहवाओं को लपेट  के  तू ,  आंधियाँ बना -बनालहू की  गर्मियों से तूं , मशाल तो जला -जलाजला दे ग़म के शामियां ,नई सुबह तो ला ज़रा                      &...
गा रहीं हैं,सूनी सड़कें ओ ! पथिक तूँ लौट आ भ्रम में क्यूँ ? सपनें है बुनता नींद से ख़ुद को जगा प्रतिक्षण प्रशंसा स्वयं लूटे मिथ्या ही राजा बना चरणों की , तूँ धूल है  सत्य विस्मृत कर चला क्षणभर की है ये रौशनी रात्...
मैं प्रश्न पूछता अक़्सर !न्याय की वेदी पर चढ़कर !लज्ज़ा तनिक न तुझको हाथ रखे है !सिर पर मैं रंज सदैव ही करता,मानुष ! स्वयं हूँ,कहकर ! लाशों के ढेर पे बैठा बन ! निर्लज्ज़ तूँ ,मरघट स्वर चीखतीं ! हरदम मेरे...
स्वीकार करता हूँ मानव संरचना कोशिका रूपी एक सूक्ष्म इकाई मात्र से निर्मित हुई है और यह भी स्वीकार्य है जिसपर मुख्य अधिकार हमारे विक्राल शरीर का है किन्तु यह भी सारभौमिक सत्य है कोशिका रूपी ये इकाई ही हमारे विक्राल शरीर का मूलभूत आधार है जिस प्रकार हमारे राष्ट्...