ब्लॉगसेतु

वो दूध पिलाती माता !वो गले लगाती माता !कोमल चक्षु में अश्रु लेकर तुझे बुलाती माता !वो जग दिखलाती माता !तुझको बहलाती माता !तेरे सिर को हृदय लगाये ब्रह्माण्ड समेटे गाथा !रोती सड़क पे माता !जिसको छोड़ा तूने कहक...
वे शहद चटातें हैं !तुमको मैं नमक लगाता हूँ !तुमको वे स्वप्न दिखाते हैं !तुमको मैं झलक दिखाता हूँ !तुमको वे रंग लगातें हैं !तुमको मैं रक्त दिखाता हूँ !तुमको गर्दन पर चाकू मलते हैं ! वे मैं बलि चढ़ा...
इस लोक मेंजन्मा !अज्ञानीकूट छिपामैंअभिमानी !सुन्दर तल हैं'कर' के मेरेजिनसे करता हूँनादानी !समय शेष हैअहम् कामेरेभ्रमित विचरता !माया वनमेंभ्रम रूपी मुझेहिरण दिखे हैस्वप्न दिवा कीबात कहे हैकाक मुझेकोयलप्रतीत हो !कर्कश वाणीअमृत ! वर्षा केमान स्वरदिन-रातपिये होसत्य प्र...
मैं हिला रहा हूँ लाशें !मैं जगा रहा हूँ आसें !उठ जा ! मुर्दे तूँ क़ब्र तोड़ के मैं बना रहा हूँ खाँचें !मैं हिला रहा हूँ लाशें !मैं जगा रहा हूँ आसें !मुर्दे तूँ झाँक ! क़ब्र से अपनी जिसमें लिपटा तूँ ,आया था नो...
प्रस्तुत 'रचना' उन पूँजीपतियों एवं धनाढ्य वर्ग के लोगों के प्रति एक 'आक्रोश' है जो देश के प्राकृतिक स्रोतों एवं सुख-सुविधाओं का ध्रुवीकरण करने में विश्वास रखते हैं। मेरी रचना का उद्देश्य  किसी जाति,धर्म व सम्प्रदाय विशेष को आहत करना नही है ,परन्तु यद...
पाए हिलनें लगे !सिंहासनों के,गड़गड़ाहट हो रहीकदमों से तेरे,देख ! वे आ रहें हैं........सौतन निद्रा जा रहीचक्षु से तेरे,हृदय में सुगबुगाहटहो रही,देख ! वे आ रहें हैं........भृकुटि तनी है ! तेरीकुछ पक रहा,आने से उनकेकुछ जल रहामनमाने से उनके,देख ! वे आ रहें हैं.........
अब आ रहा है चैन क्यूँ जागूँ ? तूँ बता कल ही अभी सोया हूँ ख़लल डालूँ,तूँ बता !         ⧪बेच ही रहें हैं तो बेचने दे !आख़िर कफ़न उनका है मैयत भी उनकी !          ⧪वो नाचतें हैं,सिर पे !जाग जाऊँगा&...
हिमालय के मैं गोद मेंथा सुषुप्त सा,रौद्र मेंहिम पिघलती जा रहीपीड़ा बन,आवेग मेंकोई पूछे ! क्यूँ पड़ा है ?मृत हुआ सा,सोच मेंदेख ! किरणें फूटतीं हैंघाटियों के मध्य मेंउठ ! खड़ा,तनकर यहाँउपदेश सा तूँ, रूप मेंकर प्रस्फुटित ! विचार तूँनिर्जरा संसार में,देख ! वो जो आ रहावायु...
मत कर ! गर्व तूं इतनासंविधान भाव बनाया मैंने स्नेह से इसे सजाया मैंने संवेदनायें पल-पल पल्लवित होंगी स्वप्न तुझे दिखलाया मैंने। मत कर ! गर्व तूं इतना उड़ा विद्वेष था आसमान में प्रेम धरा पर लाया मैंनेस्वर्ण अक्षरों में अंकित होता मा...
हृदय में उठता बुलबुला हताशाओं से, फट रहा लिख दूँ क्रांति ! लेखनी से मन ये मेरा कह रहालेकर मशालें हाथों में सुबहों निकलता नित्य हूँ जाग जा ! तूँ ऐ वतन काल तुझसे कह रहा लूटतें हैं ! भेड़िये मिलकर,अस्मिता देश की पा रहा तूँ ,...