ब्लॉगसेतु

लड़कियों की ज़िन्दगी क्या सच में दुरूह होती है ?क्या सच में उसका नसीब खराब होता है ?यदि यही सत्य है तो मत पढ़ाओ उसे !यदि उसे समय पर गरजना नहीं बता सकते तो सहनशीलता का सबक मत सिखाओ यह अधिकार रत्ती भर भी तुम्हारा नहीं  … माता-पिता हो जाने स...
एक चवन्नी बोई थी मैंने,चुराई नहीं,पापा-अम्मा की थी,बस उठाई और उसे बो दियाइस उम्मीद मेंकि खूब बड़ा पेड़ होगाऔर ढेर सारी चवन्नियाँ लगेंगी उसमेंफिर मैं तोड़ तोड़कर सबको बांटूंगी ...सबको ज़रूरत थी पैसों कीऔर मेरे भीतर प्यार थातो जब तक मासूमियत रहीबोती गई -इकन्नी,दुअन्नी,चवन...
मेसेज करते हुएगीत गाते हुएकुछ लिखते पढ़ते हुएदिनचर्या कोबखूबी निभाते हुएमुझे खुद यह भ्रम होता हैकि मैं ठीक हूँ !लेकिन ध्यान से देखो,मेरे गले में कुछ अटका है,दिमाग और मन केबहुत से हिस्सों मेंरक्त का थक्का जमा है ।. ..सोचने लगी हूँ अनवरतकि खामोशी की थोड़ी लम्बी चादर ले...
धू धू जलती हुई जब मैं राख हुईतब उसकी छोटी छोटी चिंगारियों ने मुझे बताया,बाकी है मेरा अस्तित्व,और मैं चटकने लगी,संकल्प ले हम एक हो गए,बिल्कुल एक मशाल की तरह,फिर बढ़ चले उस अनिश्चित दिशा में,जो निश्चित पहचान बन जाए ।मैं  नारी,धरती पर गिरकर,धरती में समाहित होकर,बं...
बेटी,यदि तुम सूरज बनोगीतो तुम्हारे तेज को लोग बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे,वे ज़रूरत भर धूप लेकर,तुम्हारे अस्त होने की प्रतीक्षा करेंगे ।सुबह से शाम तकएक ज़रूरत हो तुम ।जागरण का गीत हो तुम,दिनचर्या का आरम्भ हो तुम,गोधूलि का सौंदर्य हो तुम,घर लौटने का संदेश हो तुम ...फिर भ...
हादसे स्तब्ध हैं, ... हमने ऐसा तो नहीं चाहा था !घर-घर दहशत में है,एक एक सांस में रुकावट सी है,दबे स्वर,ऊंचे स्वर में दादी,नानी कह रही हैं,"अच्छा था जो ड्योढ़ी के अंदर ही हमारी दुनिया थी"नई पीढ़ी आवेश में पूछ रही,"क्या सुरक्षित थी?"बुदबुदा रही है पुरानी पीढ़ी,"ना,...
मैं वृक्ष,वर्षों से खड़ा हूँजाने कितने मौसम देखे हैं मैंने,न जाने कितने अनकहे दृश्यों का,मौन साक्षी हूँ मैं !पंछियों का रुदन सुना है,बारिश में अपनी पत्तियों का नृत्य देखा है,आकाश से मेरी अच्छी दोस्ती रही है,क्योंकि धरती से जुड़ा रहा हूँ मैं ।आज मैंने अपने शरीर से वस्...
पहले पूरे घर मेंढेर सारे कैलेंडर टँगे होते थे ।भगवान जी के बड़े बड़े कैलेंडर,हीरो हीरोइन के,प्राकृतिक दृश्य वाले, ...साइड टेबल पर छोटा सा कैलेंडररईसी रहन सहन की तरहगिने चुने घरों में ही होते थेफ्रिज और रेडियोग्राम की तरह !तब कैलेंडर मांग भी लिए जाते थे,नहीं मिलते तो...
मृत्यु अंतिम विकल्प है जीवन काया जीवन का दूसरा अध्याय है ?जहाँ हम सही मायनों मेंआत्मा के साथ चलते हैंया फिर अपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति कारहस्यात्मक खेल खेलते हैं ?!औघड़,तांत्रिक शव घाट पर हीखुद को साधते हैं... आखिर क्यों !जानवरों की तरह मांस भक्षण करते हैंमदिरा का सेव...
मन को बहलानेऔर भरमाने के लिएमैंने कुछ ताखों परतुम्हारे होने की बुनियाद रख दी ।खुद में खुद से बातें करते हुएमैंने उस होने में प्राण प्रतिष्ठा की,फिर सहयात्री बन साथ चलने लगी,चलाने लगी ...लोगों ने कहा, पागल हो !भ्रम में चलती हो,बिना कोई नाम दिए,कैसे कोई ख्याली बुत बन...